सिद्धान्त-माधुरी · पद 13
अरे मन! तू निज स्वारथ साध।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: are mana! tū nija swāratha sādha
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अरे मन! तू निज स्वारथ साध।
2जब लौं स्वारथ साधि न ले निज, कल जनि ले पल आध।
3स्वारथ साधन ही महँ निशि दिन, करु अभ्यास अगाध।
4तजि दे मूढ़ परार्थ कल्पनहिं, करु श्रम गतिहिं अबाध।
5जान्यो स्वारथ तिन जिन छिन-छिन, राधावर अवराध।
6विषय-बालि कहँ करु “कृपालु” बध, प्रेमबान जनु व्याध॥
हिन्दी भावार्थ
अरे मन! तू अपने स्वार्थ को सिद्ध कर। जब तक तेरा वास्तविक स्वार्थ न सिद्ध हो जाय एक क्षण को भी चैन न ले। सच्चे स्वार्थ की साधना में ही प्रतिक्षण घोर अभ्यास कर। अरे मूर्ख! परार्थ की कल्पना छोड़ दे, एवं पूर्ण शक्ति से परिश्रम कर। पक्का स्वार्थी वही है जो प्रतिक्षण राधारमण की आराधना करता है। कृपालु' कहते हैं कि तू उपर्युक्त बात मान कर श्यामसुन्दर से प्रेम कर, एवं प्रेम बाण के द्वारा भगवान राम की तरह मायिक विषय रूपी बालि का वध कर दे तथा अनन्त काल के लिए दिव्य विषय में लीन हो जा।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 71