सिद्धान्त-माधुरी · पद 12
अरे मन! चार दिना की बात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: are mana! chāra dinā kī bāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अरे मन! चार दिना की बात।
2नर-तनु शरद चाँदनी बीते, पुनि अँधियारी रात।
3तू सोवत कछु जानत नाहीं, काल लगायो घात।
4तजत न नींद यदपि विषयन के, छिन छिन जूते खात।
5अवसर चूकि फिरिय चौरासी, कर मींजत पछितात।
6रसिकनि कही “कृपालु” मानु गहु, युगल चरण जलजात॥
हिन्दी भावार्थ
अरे मन! चार दिन की बात है, क्योंकि मनुष्य शरीर रूपी शरद्काल की चाँदनी बीत जाने पर फिर चौरासी लाख योनियों की अँधेरी रात आ जायेगी। तू अज्ञान की नींद में सो रहा है। काल अवसर देख रहा है, तुझे यह पता नहीं। यद्यपि सांसारिक विषय वासनाओं के क्षण-क्षण में जूते खा रहा है फिर भी निद्रा का परित्याग नहीं करता। याद रख इस अवसर को खो देने पर फिर हाथ मींजता हुआ और पछताता हुआ चौरासी लाख योनियों में भटकेगा। अतएव 'कृपालु' कहते हैं कि महापुरुषों के आदेशों को मान ले अर्थात् राधाकृष्ण के युगल-चरण-कमलों को शरण चला जा।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 70-71