सिद्धान्त-माधुरी · पद 11
अरे मन! काहे करत गुमान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: are mana! kāhe karata gumāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अरे मन! काहे करत गुमान।
2विष्ठा-विषय हेतु निशि वासर, सुनहुँ नेकु करि कान।
3बनत दीन बनितादिक सन्मुख, पुनि कहँ रह अभिमान।
4इत तो रह अभिमान दास हौं, मम स्वामी भगवान।
5भूल होत सब ते, पै बुध जो, लेत भूल निज मान।
6अबहूँ चेत “कृपालु” हेत कर, सुंदर श्याम सुजान॥
हिन्दी भावार्थ
अरे मन! तू व्यर्थ ही अभिमान करता है। कान खोल कर सुन। तू इन्द्रियों के विषयों की विष्ठा के लिये दिन-रात स्त्री पति आदि के समक्ष अत्यन्त दीन बना करता है फिर तेरा स्वाभिमान कहाँ रह गया। किन्तु इधर तो यह अभिमान भी सदा बना रहता है कि मैं दास हूँ एवं श्यामसुन्दर मेरे स्वामी हैं। संसार में भूल सबसे होती है, किन्तु बुद्धिमान् वही है जो अपनी भूल को मान लेता है। 'कृपालु' कहते हैं कि तू भी अपनी भूल मानकर सावधान हो जा एवं श्यामसुन्दर से प्रेम कर।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 70