सिद्धान्त-माधुरी · पद 10
अरे मन! उभय रूप जग जान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: are mana! ubhaya rūpa jaga jāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अरे मन! उभय रूप जग जान।
2शब्दादिक विषयन पदार्थ जे, स्थूल रूप तेहि मान।
3इनकी जो उर बिधुर कामना, ताहि सूक्ष्म अनुमान।
4स्थूल जगत के तजत, जात नहिं, सूक्ष्म जगत बलवान।
5पै जो सूक्ष्म जगत को तजि दे, नहिं स्थूलहिं रह भान।
6ताते तजिय “कृपालु” कामना, भजिय रैन दिन कान्ह॥
हिन्दी भावार्थ
अरे मन! यह संसार दो प्रकार का है। एक स्थूल दूसरा सूक्ष्म। शब्दादिक विषय सम्बन्धी जितने भौतिक पदार्थ हैं, वही स्थूल संसार है एवं इन पदार्थों की हृदय में जो बलवती कामना है वही सूक्ष्म संसार है। स्थूल संसार के छोड़ देने से सूक्ष्म संसार नहीं समाप्त होता अर्थात् सांसारिक पदार्थों के परित्याग मात्र से इच्छायें नहीं समाप्त होतीं। किन्तु यदि सूक्ष्म संसार अर्थात् इच्छाओं का परित्याग कर दे तो स्थूल संसार का भान ही नहीं रहता।'कृपालु' कहते हैं कि इसके लिए निरन्तर श्यामसुन्दर का भजन कर।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 69