सिद्धान्त-माधुरी · पद 9
अरे मन! इहै सार संसार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: are mana! ihai sāra sansāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अरे मन! इहै सार संसार।
2सुर दुर्लभ तनु पाय भजन करु, निशि दिन नंदकुमार।
3लगत न दाम छदाम याम वसु, सुमिरु श्याम सरकार।
4हरि व्यापक संसार एकरस, प्रति परमाणु मझार।
5तिनके नाम-रूप-गुण गावत, का घटि जात तिहार।
6झूठो जप, तप, जोग, याग, व्रत, नेम, धर्म, आचार।
7हरि बिनु सुख “कृपालु” नहिं सपनेहुँ, पचि पचि मरिय हजार॥
हिन्दी भावार्थ
अरे मन! इस.असार संसार में यही सार है कि देव दुर्लभ मानव-देह पाकर, निरन्तर श्यामसुन्दर का भजन कर। तू ही सोच! इसमें तेरी कौड़ी भी तो नहीं खर्च होनी है। एकमात्र उन्हीं का स्मरण कर। श्यामसुन्दर संसार के परमाणु परमाणु में व्याप्त हैं। उन्हीं के नाम, रूप एवं गुणों का गान कर। तेरा कुछ घट नहीं जायगा। जप, तप, योग, यज्ञ, व्रत नेम, धर्म, आचार इनसे माया निवृत्ति नहीं हो सकती। 'कृपालु' कहते हैं कि बिना श्यामसुन्दर की शरण गये स्वप्न में भी सुख नहीं मिल सकता, चाहे करोड़ों साधन करके मर जाओ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 68-69