सिद्धान्त-माधुरी · पद 8
अरे मन! अस तृष्णा बलवान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: are mana! asa tṛishṇā balawāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अरे मन! अस तृष्णा बलवान।
2बड़े बड़े भूपति भये भूतल, उदय अस्त लौं भान।
3तिनहुँन की सोइ दशा रही जो, एक भिखारिहिं जान।
4यह तृष्णा नहिं छोड़ति इंद्रहुँ, जेहि सुरपति सब मान।
5जब लौ नहिं सुमिरहु मन निशिदिन, सुंदर श्याम सुजान।
6तब लौ सुख “कृपालु” नहिं पैहौं, वेद पुरान प्रमान॥
हिन्दी भावार्थ
अरे मन! यह तृष्णा इतनी बलवती है कि इस पृथ्वी पर बड़े-बड़े राजा हुए जिनका सम्पूर्ण धरातल पर राज्य था किंतु उनकी दशा भी ठीक एक भिखारी के ही समान थी। कहाँ तक कहें यह तृष्णा देवराज इन्द्र को भी नहीं छोड़ती जिसे सब देवताओं का स्वामी मानते हैं। हे मन! वेद पुराण चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं कि जब तक तू श्यामसुन्दर का निरन्तर स्मरण नहीं करेगा 'कृपालु' कहते हैं कि तब तक सुख न पा सकेगा।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 68