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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 7

अरे मन! अवसर बीत्यो जात।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: are mana! avasara bītyo jāta

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1अरे मन! अवसर बीत्यो जात।

2काल-कवल वश विधि हरि, हर सब, तोरी कहा बिसात।

3लहि पारस नर-तनु सुर-दुर्लभ, गुंजन-हित भटकात।

4बधिर, अंध जिमि सुनत न देखत, रहत विषय मदमात।

5"अब करिहौं, अब करिहौं", इमि कहि, रहि जैहौ पछितात।

6होत “कृपालु” प्रलय पल महँ तू, केहि बल पर इतरात॥

हिन्दी भावार्थ

अरे मन! यह स्वर्ण अवसर बीता जा रहा है। तेरी तो गिनती ही क्या है ब्रह्मा, विष्णु, शंकर आदि सभी सीमित आयु वाले काल के ग्रास बन जाते हैं। पारस के समान देवताओं के लिए भी दुर्लभ मनुष्य-शरीर को पाकर भी तू अज्ञानवश सांसारिक विषयरूपी घुंघची के बनावटी सौंदर्य पर मुग्ध हो रहा है। बहरे एवं अंधे के समान तू न तो सत्पुरुषो की बातें ही सुनता और न स्वयं ही संसार के मिथ्यापन को देखता है। विषयों में ही मतवाला हो रहा है! 'अब इसके बाद करूंगा अब इसके बाद करूँगा'ऐसा बार-बार कहते हुए रह जायगा। अन्त में पछताना ही पलले पड़ेगा। 'कृपालु' कहते हैं कि एक में तो प्राण महाप्रयाण (मृत्यु) कर जाते हैं, तू बार-बार भविष्य के लिए क्यों छोड़ देता है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 67