सिद्धान्त-माधुरी · पद 6
अरे मन! अबहुँ बात ले मान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: are mana! abahuṁ bāta le māna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अरे मन! अबहुँ बात ले मान।
2हौं यह भलीभाँति हौं जानत, मानत तोहिं बलवान।
3लख चौरासि योनि नचायो, नट मरकट उनमान।
4पै हौं एक बात पूछत हौं, उत्तर दो तब जान।
5पियत विषय-विष रस निशिवासर, क्यों नहिं प्यास बुझान।
6तजि “कृपालु” हठ अबहुँ शरण गहु, सुंदर श्याम सुजान॥
हिन्दी भावार्थ
अरे मन! अब भी हमारी बात मान ले। मैं यह भली-भाँति जानता एवं मानता हूँ कि तू महान् शक्तिशाली है क्योंकि तूने चौरासी लाख योनियों में मुझे उसी प्रकार नचाया है जिस प्रकार एक नट किसी बंदर को नचाता है। किन्तु मैं हार से वह यह कि अनादि काल से लत सला बात पूछता हूँ, यदि तुम इसका उत्तर दे दो तो हम अपनी हार मान लें। वह यह कि अनादि काल से निरन्तर सांसारिक विषयों के विष रस को पीकर भी अब तक तुम्हारी प्यास क्यों नहीं बुझी? 'कृपालु' कहते हैं कि अब भी अवसर है दुराग्रह छोड़कर श्यामसुन्दर की शरण में चले जाओ, सब बिगड़ी बन जायगी।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 66-67