सिद्धान्त-माधुरी · पद 5
अमोलक रतन मिलत बिनु मोल।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: amolaka ratana milata binu mola
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अमोलक रतन मिलत बिनु मोल।
2प्रेम-रतन याचत ज्ञानीजन, सुन लो कानहिं खोल।
3श्याम प्रेम बिनु ब्रह्म-समाधिहुँ, मनहुँ निंब रस घोल।
4तेहि बिनु कर्म, योग सब छूछो, लेहु तराजुहिं तोल।
5स्वर्ग कर्म ते, सिद्धि योग ते, प्रेम बोल हरि बोल।
6रतन “कृपालु” अमोलक पायो, हमहुँ बजावत ढोल॥
हिन्दी भावार्थ
अमूल्य रत्न बिना मूल्य के मिलता है, यह कैसी विलक्षण बात है। इस अमूल्य प्रेम-रत्न को परमहँस लोग भी चाहते हैं, कान खोलकर सुन लो। श्यामसुन्दर के प्रेम के बिना ब्रह्ज्ञानियों की निर्विकल्प समाधि भी नीम के रस के समान कड़वी है। प्रेम के बिना कर्म एवं योगादि सब थोथे हैं, क्योंकि कर्म से स्वर्ग मिलता है एवं योग से सिद्धि मिल सकती है किन्तु प्रेम तो "हरि बोल'बोलने से ही प्राप्त हो सकता है। कृपालु' कहते हैं हमने तो यह अमूल्य निधि ढोल बजाकर प्राप्त कर ली।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 65-66