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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 4

अनोखो हरि तुम्हरो खिलवार।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: anokho hari tumharo khilavāra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1अनोखो हरि तुम्हरो खिलवार।

2सगुण स्वाँग धरि सदा सदा ते, ठग्यो सबै संसार।

3जो लीला शिव, शुक, सनकादिक, मन बुधि अगम अपार।

4सो नित करत पामरन सन्मुख, लै पुनि-पुनि अवतार।

5निज स्वभाव वश तर्क करत जग, लखि तुम्हरो व्यवहार।

6होत नाम अपराध सदा इमि, किमि हो जग निस्तार।

7बिनु जाने विश्वास होत नहिं, गये संत पचि हार।

8जेहि “कृपालु” तुम कबहुँ जनावत, सोई जाननहार॥

हिन्दी भावार्थ

हे श्री कृष्ण! तुम्हारी लीला अत्यन्त ही विचित्र है। सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण के अनेकानेक स्वाँग बनाकर, अनादि काल से समस्त संसार को तुमने ठगा है। तुम्हारी जो लीला शंकर, सनकादिक परमहँसों के भी मने-बुद्धि में संशय पैदा कर देती है, उसी लीला को तुम बार-बार अवतार लेकर सदा ही संसारी जीवों के सामने करते हो। इसके परिणाम-स्वरूप अपने स्वभावानुसार तुम्हारी लीलाओं को देखकर सांसारिक जीव शंकाएं करते हैं। उनकी समझ में यह नहीं आ सकता कि तीनों गुणों का कार्य करते हुए भी तुम गुणातीत कैसे हो। इस प्रकार जीव जब निरन्तर ही नामापराध-रूपी अक्षम्य पाप कमाता है, तब उसका उद्धार किस प्रकार हो सकता है। हे श्रीकृष्ण! बिना तुम्हारे अंतरंग रहस्यों को समझे किसी भी जीव को तुम्हारे प्रति विश्वास नहीं हो पाता, चाहे महापुरुष कितने ही प्रयत्न क्यों न करे। 'कृपालु' कहते हैं कि तुम्हारी अलौकिक लीलाओं से युक्त योगमाया-कीड़ाओं को वही समझ सकता है जिसको तुम अपनी कृपा से कभी समझा देते हो।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 64-65