# अनोखो हरि तुम्हरो खिलवार।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0013-M03-K004
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: सिद्धान्त-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 4
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 10–10

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>अनोखो हरि तुम्हरो खिलवार।  
<a id="line-2"></a>सगुण स्वाँग धरि सदा सदा ते, ठग्यो सबै संसार।  
<a id="line-3"></a>जो लीला शिव, शुक, सनकादिक, मन बुधि अगम अपार।  
<a id="line-4"></a>सो नित करत पामरन सन्मुख, लै पुनि-पुनि अवतार।  
<a id="line-5"></a>निज स्वभाव वश तर्क करत जग, लखि तुम्हरो व्यवहार।  
<a id="line-6"></a>होत नाम अपराध सदा इमि, किमि हो जग निस्तार।  
<a id="line-7"></a>बिनु जाने विश्वास होत नहिं, गये संत पचि हार।  
<a id="line-8"></a>जेहि “कृपालु” तुम कबहुँ जनावत, सोई जाननहार॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हे श्री कृष्ण! तुम्हारी लीला अत्यन्त ही विचित्र है। सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण के अनेकानेक स्वाँग बनाकर, अनादि काल से समस्त संसार को तुमने ठगा है। तुम्हारी जो लीला शंकर, सनकादिक परमहँसों के भी मने-बुद्धि में संशय पैदा कर देती है, उसी लीला को तुम बार-बार अवतार लेकर सदा ही संसारी जीवों के सामने करते हो। इसके परिणाम-स्वरूप अपने स्वभावानुसार तुम्हारी लीलाओं को देखकर सांसारिक जीव शंकाएं करते हैं। उनकी समझ में यह नहीं आ सकता कि तीनों गुणों का कार्य करते हुए भी तुम गुणातीत कैसे हो। इस प्रकार जीव जब निरन्तर ही नामापराध-रूपी अक्षम्य पाप कमाता है, तब उसका उद्धार किस प्रकार हो सकता है। हे श्रीकृष्ण! बिना तुम्हारे अंतरंग रहस्यों को समझे किसी भी जीव को तुम्हारे प्रति विश्वास नहीं हो पाता, चाहे महापुरुष कितने ही प्रयत्न क्यों न करे। 'कृपालु' कहते हैं कि तुम्हारी अलौकिक लीलाओं से युक्त योगमाया-कीड़ाओं को वही समझ सकता है जिसको तुम अपनी कृपा से कभी समझा देते हो।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 64-65

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
