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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 3

अनोखो लख्यौं जगत व्यवहार।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: anokho lakhyoṁ jagata vyavahāra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1अनोखो लख्यौं जगत व्यवहार।

2जब लौं स्वारथ सिद्ध होत रह, तब लौं नात हजार।

3जब ही स्वार्थ-हानि निज देखत, अरि-सम ताहि निहार।

4निशि-दिन यह कौतुक जग देखत, तदपि न करत विचार।

5संतन-सभा यदपि सिर झूमत, मन रह विषय मझार।

6कहत “कृपालु” भागवत गीता, उर-अभिमान अपार॥

हिन्दी भावार्थ

इस संसार का व्यवहार मुझे बड़ा ही विचित्र दिखाई पड़ा। जब तक किसी का, किसी से, किसी प्रकार का लाभ होता रहता है, तब तक वह उससे अनन्तानन्त प्रकार से सम्बन्ध जोड़े रहता है किन्तु जब वह अपनी स्वार्थ सिद्धि में न्यूनता पाता है, तब वह उसी सम्बन्धी को शत्रु के समान देखता है। यद्यपि जीव इसी उपरोक्त विचित्र नाटक को निरन्तर समस्त संसार में देखता रहता है, फिर भी विचित्रता यह है कि इस विषय में कुछ भी विचार नहीं करता। सन्तों की सभाओं में समझते हुए या न समझते हुए यद्यपि उन सभी संसारी जीवों का मस्तक मस्ती से मानो झूमने सा लगता है किन्तु मन का लगाव सांसारिक विषयों की ही ओर रहता है। 'कृपालु अपने लिये कहते हैं कि मैं भी भागवत एवं गीता आदि का उपदेशक बना हूँ किन्तु हृदय में अभिमान भरा हुआ है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 63-64