सिद्धान्त-माधुरी · पद 2
अनजान मूढ़ मन मान रे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: anajāna mūd̤ha mana māna re
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अनजान मूढ़ मन मान रे।
2येहि संसार असार जानि के, करु नँदनंदन ध्यान रे।
3बड़े बड़े नामी ग्रामी जे, तिनहुँ भिखारी जान रे।
4इनहिंन सुत, पति, बनितनि कारन, अगनित जनम नसान रे।
5जब लौं रह तरु फल ये पक्षिन, चहकत करि गुनगान रे।
6पै “कृपालु” फल गिरत लेत सब, लंबी गगन उड़ान रे॥
हिन्दी भावार्थ
अरे मूर्ख मन! मेरी बात मान ले। इस संसार क असार समझकर श्यामसुन्दर का स्मरण कर ले। जो तुझे बड़े बड़े नामी दिखाई पड़ते हैं उनको भी भिखारी ही समझ क्योंकि तेरे ही समान इनकी भी तृष्णा है। अरे मन! इन स्त्री पुत्र, पति के कारण तेरे अनन्त जन्म नष्ट हो चुके। ये सब ऐर पक्षी हैं कि जब तक वृक्ष में फल लगा रहता है उसक गुणगान करते हुए चहकते रहते हैं। 'कृपालु' कहते हैं वि जैसे ही फल गिर जाता है, यह सब पक्षी लम्बी उड़ान के साः आकाश में भाग जाते हैं, अर्थात् जब तक इनका स्वार्थ सिर् होता रहता है तभी तक ये प्यार का अभिनय करते हैं किन जैसे ही स्वार्थ सिद्ध हो जाता है आँख उठाकर भी उसकी ओ नहीं देखते।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 63