सिद्धान्त-माधुरी · पद 1
अचंभो इक देख्यो ब्रज माहिं।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: achambho ika dekhyo braja māhiṁ
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अचंभो इक देख्यो ब्रज माहिं।
2श्रुतिन महावाक्यन अस्तुति सुनि, जो मुख बोलत नाहिं।
3सोई गोकुल गोकुल बछरनि की, बोलनि सोँ बतराहिं।
4जो स्वामिहुँ बनि शंभु समाधिहुँ, जावन महँ सकुचाहिं।
5सोइ निदरतहूँ ब्रजवनितनि घर, जावन महँ बलि जाहिं।
6लखि “कृपालु” करतूति प्रीति येहि, ज्ञानीजन खिसियाहिं॥
हिन्दी भावार्थ
मैंने ब्रज में एक महान आश्चर्य देखा। जो ब्रह्म वेदों के महावाक्यों की स्तुतियों को सुनकर मुँह से नहीं बोलता, वह ब्रह्म गोकुल में गायों के बछड़ों की अव्यक्त भाषा से बातें करता है। जो ब्रह्म भगवान् शिव की समाधि में, स्वामी बनकर जाने में भी संकोच करता है, वही ब्रह्म अपमानित होकर भी ब्रजांगनाओं के घर आने में बलिहार जाता है। 'कृपालु' कहते हैं कि प्रेम की इस विलक्षण करतूत को देखकर ज्ञानी लोग अत्यन्त खिसिया जाते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 62