आरती-माधुरी · पद 3
श्री वृषभानुदुलारी की आरती
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: āratī bhānudulārī kī, ki shrī barasāne vārī kī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1श्री वृषभानुदुलारी की आरती
2आरती भानुदुलारी की, कि श्री बरसाने वारी की।
3विराजै सिंहासन श्यामा,
4दिव्य श्री वृन्दावन धामा,
5ढुरावैं चँवर सुघर बामा,
6पलोटैं पग पूरन कामा,
7लली पग अंक, चापि निःशंक, श्याम जनु रंक,
8पाइ निधि पारस प्यारी की।
9गौर सिर कनक मुकुट राजै,
10चंद्रिका चारु सुछवि छाजै,
11कुटिल कुंतल अलि भल भ्राजै,
12लखत जेहि शिखि कलाप लाजै,
13माँग सिंदूर, मोतियन पूर, सजीवन मूर,
14ब्रह्म गोवर्धनधारी की।
15श्रवण बिच करणफूल झलकै,
16नासिका बिच बेसर हलकै
17नयन बिच प्रेम-सुधा छलकै,
18बंधु बल के लखि लखि ललकै,
19चपलनथ चमक, दसन-दुति-दमक, सुमुखि-मुख-रमक,
20मधुर मुसुकनि सुकुमारी की।
21मोतियन लर उर मणि माला,
22चिबुक झलकत इक तिल काला,
23शंभु शुक दै सँग करताला,
24लली गुन गावति ब्रजबाला,
25कबहुँ मुख मुरनि, कबहुँ दृग दुरनि, कबहुँ दृग जुरनि,
26कबहुँ सुधि भुरनि बिहारी की।
27किनारिन जरिन नील सारी,
28कंचुकी कुमकुम रँग वारी,
29चुरी कर कंकन मनहारी,
30छीन कटि किंकिनि छवि न्यारी,
31पायलनि पगनि, मिहावरि लगनि, बीछुवनि नगनि,
32“कृपालु” सुकीर्ति कुमारी की॥
हिन्दी भावार्थ
मैं श्री बरसाने वाली श्री वृषभानुदुलारी की आरती करता हूँ। श्री किशोरी जी दिव्य वृन्दावन धाम में दिव्य सिंहासन पर विराजमान हैं। जिनके दोनों ओर परम सुन्दर सखियाँ चँवर ढुरा रही हैं, एवं पूर्णकाम श्यामसुन्दर उनके चरण दबा रहे हैं। किशोरी जी के चरणकमलों को निर्भयतापूर्वक दबाते हुए श्यामसुन्दर उसी प्रकार आनन्द में विभोर हो रहे हैं जिस प्रकार कोई अत्यन्त निर्धन सहसा पारसमणि पाकर अत्यन्त आनन्दमग्न हो जाता है। श्री किशोरी जी के मस्तक पर सुवर्ण का मुकुट सुशोभित हो रहा है। सुन्दर चन्द्रिका की छटा अलग शोभा दे रही है। घुँघराले बालों की झाँकी और भी निराली है, जिसे देखकर मोर के पुच्छभार भी लज्जित होते हैं। किशोरी जी की माँग सिन्दूर एवं मोतियों की लड़ियों से अलंकृत है। श्री किशोरी जी सच्चिदानन्द ब्रह्म की जीवनदायिनी आत्मा हैं। श्री किशोरी जी के कानों में कर्णफूल शोभा पा रहे हैं। नासिका में बेसर की छटा दर्शनीय है। आँखों से मानो प्रेम का अमृत छलक रहा है, जिनको देखकर बलराम के भैया श्यामसुन्दर बार-बार ललचा रहे हैं। किशोरी जी की नासिका में चमचमाती हुई नथ हिल रही है। मुस्कराने से सुन्दर दाँत चमक रहे हैं। मुख की कान्ति अत्यन्त कमनीय है। मधुर मुसकान का बखान नहीं हो सकता। किशोरी जी के वक्षःस्थल पर मोतियों एवं मणियों की माला लटक रही है। ठोड़ी के ऊपर एक सुन्दर काले तिल का चिह्न है। भगवान् शंकर, परमहंस शुकदेव आदि हाथों से ताली बजा रहे हैं एवं ब्रजांगनाएँ वृषभानुनन्दिनी के गुण गा रही हैं। श्यामसुन्दर को चरण दबाते हुए देख किशोरी जी कभी तो अपने मुख को दूसरी ओर मोड़ लेती हैं, कभी लज्जा के कारण केवल आँखों से ही दूसरी ओर देखने लगती हैं एवं कभी श्यामसुन्दर की ओर प्रेम भरी दृष्टि से निहार देती हैं, जिसके परिणामस्वरूप प्रेम-विभोर होकर श्यामसुन्दर अपनी सुधि-बुधि भूल जाते हैं। श्री किशोरी जी जरी की किनारी वाली, नीले रंग की साड़ी पहिने हुए हैं। वक्षःस्थल पर कुमकुम रंग वाली चोली है। हाथ में चूड़ी एवं कंकण मन को लुभा रहे हैं। पतली सी कमर में करधनी की छटा अत्यन्त ही निराली है। चरण-कमलों में पायल पहिने हुए हैं। चरण के नीचे के भाग में लाल रंग की मिहावर लगी हुई है। चरण की अंगुलियों में नगों से युक्त बिछुए पहिने हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि उपर्युक्त शृंगार वाली कीर्ति की कुमारी की मैं आरती करता हूँ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 58,60