# श्री वृषभानुदुलारी की आरती

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0009-M02-K003
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: आरती-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 3
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 7–8

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>श्री वृषभानुदुलारी की आरती  
<a id="line-2"></a>आरती भानुदुलारी की, कि श्री बरसाने वारी की।  
<a id="line-3"></a>विराजै सिंहासन श्यामा,  
<a id="line-4"></a>दिव्य श्री वृन्दावन धामा,  
<a id="line-5"></a>ढुरावैं चँवर सुघर बामा,  
<a id="line-6"></a>पलोटैं पग पूरन कामा,  
<a id="line-7"></a>लली पग अंक, चापि निःशंक, श्याम जनु रंक,  
<a id="line-8"></a>पाइ निधि पारस प्यारी की।  
<a id="line-9"></a>गौर सिर कनक मुकुट राजै,  
<a id="line-10"></a>चंद्रिका चारु सुछवि छाजै,  
<a id="line-11"></a>कुटिल कुंतल अलि भल भ्राजै,  
<a id="line-12"></a>लखत जेहि शिखि कलाप लाजै,  
<a id="line-13"></a>माँग सिंदूर, मोतियन पूर, सजीवन मूर,  
<a id="line-14"></a>ब्रह्म गोवर्धनधारी की।  
<a id="line-15"></a>श्रवण बिच करणफूल झलकै,  
<a id="line-16"></a>नासिका बिच बेसर हलकै  
<a id="line-17"></a>नयन बिच प्रेम-सुधा छलकै,  
<a id="line-18"></a>बंधु बल के लखि लखि ललकै,  
<a id="line-19"></a>चपलनथ चमक, दसन-दुति-दमक, सुमुखि-मुख-रमक,  
<a id="line-20"></a>मधुर मुसुकनि सुकुमारी की।  
<a id="line-21"></a>मोतियन लर उर मणि माला,  
<a id="line-22"></a>चिबुक झलकत इक तिल काला,  
<a id="line-23"></a>शंभु शुक दै सँग करताला,  
<a id="line-24"></a>लली गुन गावति ब्रजबाला,  
<a id="line-25"></a>कबहुँ मुख मुरनि, कबहुँ दृग दुरनि, कबहुँ दृग जुरनि,  
<a id="line-26"></a>कबहुँ सुधि भुरनि बिहारी की।  
<a id="line-27"></a>किनारिन जरिन नील सारी,  
<a id="line-28"></a>कंचुकी कुमकुम रँग वारी,  
<a id="line-29"></a>चुरी कर कंकन मनहारी,  
<a id="line-30"></a>छीन कटि किंकिनि छवि न्यारी,  
<a id="line-31"></a>पायलनि पगनि, मिहावरि लगनि, बीछुवनि नगनि,  
<a id="line-32"></a>“कृपालु” सुकीर्ति कुमारी की॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

मैं श्री बरसाने वाली श्री वृषभानुदुलारी की आरती करता हूँ। श्री किशोरी जी दिव्य वृन्दावन धाम में दिव्य सिंहासन पर विराजमान हैं। जिनके दोनों ओर परम सुन्दर सखियाँ चँवर ढुरा रही हैं, एवं पूर्णकाम श्यामसुन्दर उनके चरण दबा रहे हैं। किशोरी जी के चरणकमलों को निर्भयतापूर्वक दबाते हुए श्यामसुन्दर उसी प्रकार आनन्द में विभोर हो रहे हैं जिस प्रकार कोई अत्यन्त निर्धन सहसा पारसमणि पाकर अत्यन्त आनन्दमग्न हो जाता है। श्री किशोरी जी के मस्तक पर सुवर्ण का मुकुट सुशोभित हो रहा है। सुन्दर चन्द्रिका की छटा अलग शोभा दे रही है। घुँघराले बालों की झाँकी और भी निराली है, जिसे देखकर मोर के पुच्छभार भी लज्जित होते हैं। किशोरी जी की माँग सिन्दूर एवं मोतियों की लड़ियों से अलंकृत है। श्री किशोरी जी सच्चिदानन्द ब्रह्म की जीवनदायिनी आत्मा हैं। श्री किशोरी जी के कानों में कर्णफूल शोभा पा रहे हैं। नासिका में बेसर की छटा दर्शनीय है। आँखों से मानो प्रेम का अमृत छलक रहा है, जिनको देखकर बलराम के भैया श्यामसुन्दर बार-बार ललचा रहे हैं। किशोरी जी की नासिका में चमचमाती हुई नथ हिल रही है। मुस्कराने से सुन्दर दाँत चमक रहे हैं। मुख की कान्ति अत्यन्त कमनीय है। मधुर मुसकान का बखान नहीं हो सकता। किशोरी जी के वक्षःस्थल पर मोतियों एवं मणियों की माला लटक रही है। ठोड़ी के ऊपर एक सुन्दर काले तिल का चिह्न है। भगवान् शंकर, परमहंस शुकदेव आदि हाथों से ताली बजा रहे हैं एवं ब्रजांगनाएँ वृषभानुनन्दिनी के गुण गा रही हैं। श्यामसुन्दर को चरण दबाते हुए देख किशोरी जी कभी तो अपने मुख को दूसरी ओर मोड़ लेती हैं, कभी लज्जा के कारण केवल आँखों से ही दूसरी ओर देखने लगती हैं एवं कभी श्यामसुन्दर की ओर प्रेम भरी दृष्टि से निहार देती हैं, जिसके परिणामस्वरूप प्रेम-विभोर होकर श्यामसुन्दर अपनी सुधि-बुधि भूल जाते हैं। श्री किशोरी जी जरी की किनारी वाली, नीले रंग की साड़ी पहिने हुए हैं। वक्षःस्थल पर कुमकुम रंग वाली चोली है। हाथ में चूड़ी एवं कंकण मन को लुभा रहे हैं। पतली सी कमर में करधनी की छटा अत्यन्त ही निराली है। चरण-कमलों में पायल पहिने हुए हैं। चरण के नीचे के भाग में लाल रंग की मिहावर लगी हुई है। चरण की अंगुलियों में नगों से युक्त बिछुए पहिने हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि उपर्युक्त शृंगार वाली कीर्ति की कुमारी की मैं आरती करता हूँ।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 58,60

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

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