# अमोलक रतन मिलत बिनु मोल।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0014-M03-K005
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: सिद्धान्त-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 5
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 11–11

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>अमोलक रतन मिलत बिनु मोल।  
<a id="line-2"></a>प्रेम-रतन याचत ज्ञानीजन, सुन लो कानहिं खोल।  
<a id="line-3"></a>श्याम प्रेम बिनु ब्रह्म-समाधिहुँ, मनहुँ निंब रस घोल।  
<a id="line-4"></a>तेहि बिनु कर्म, योग सब छूछो, लेहु तराजुहिं तोल।  
<a id="line-5"></a>स्वर्ग कर्म ते, सिद्धि योग ते, प्रेम बोल हरि बोल।  
<a id="line-6"></a>रतन “कृपालु” अमोलक पायो, हमहुँ बजावत ढोल॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

अमूल्य रत्न बिना मूल्य के मिलता है, यह कैसी विलक्षण बात है। इस अमूल्य प्रेम-रत्न को परमहँस लोग भी चाहते हैं, कान खोलकर सुन लो। श्यामसुन्दर के प्रेम के बिना ब्रह्ज्ञानियों की निर्विकल्प समाधि भी नीम के रस के समान कड़वी है। प्रेम के बिना कर्म एवं योगादि सब थोथे हैं, क्योंकि कर्म से स्वर्ग मिलता है एवं योग से सिद्धि मिल सकती है किन्तु प्रेम तो "हरि बोल'बोलने से ही प्राप्त हो सकता है। कृपालु' कहते हैं हमने तो यह अमूल्य निधि ढोल बजाकर प्राप्त कर ली।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 65-66

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
