प्रकीर्ण-माधुरी · पद 18
लिय फाँसी गले महँ डार, अब का सोच करे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: liya phāṁsī gale mahaṁ ḍāra, aba kā socha kare
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1लिय फाँसी गले महँ डार, अब का सोच करे।
2हौं प्रथमहिं तोहिं बरज्यों आली,
3बचियो छल छलिया वनमाली।
4नहिं मानी करन गई प्यार, अब का सोच करे।
5तू घर की रही न घाट कि त्यों,
6चूल्हे की हाँडी काठ कि ज्यों।
7जो होनी थी हो गई यार, अब का सोच करे।
8अब तो है संगिनि एक तेरी,
9बस हाय-हाय दिखराय एरी।
10हरि कै गयो बंटाढार, अब का सोच करे।
11जब ओखलि में सखि! सिर धरना,
12तो चोट ते काहे को डरना।
13येहि यारी “कृपालु” बलिहार, अब का सोच करे॥
हिन्दी भावार्थ
अरी सखि! जब तूने अपने हाथ से अपने गले में फासी डाल ली तो अब क्यों पछताती है। मैंने तुझे पहले ही रोका था कि उस छलिया के छल से बची रहना। तूने मेरी बात नहीं मानी और प्यार करने के लिए गयी, तब फिर अब क्यो पछताती है। अरी सखि! अब तो तू चूल्हे पर चढ़ी हुई लकड की हाँडी के समान न घर की रही न घाट की रही किन्तु जे होना था सो हो गया, अब क्यों पछताती है। अरी सखि! अब तो मुझे तेरी एक ही संगिनि बस "हाय, हाय'करना, यही दिखाई पड़ती है। श्यामसुन्दर बंटाढार कर गये, अब क्यो पछताती है। अरी सखि! जब कोई ओखली में सिर रख ले तो उसे चोट से नहीं डरना चाहिए। 'कृपालु' कहते हैं कि हम र जीवात्मा एवं परमात्मा के दिव्य प्रेम पर बलिहार जाते हैं इसमें पछताने की क्या आवश्यकता है, यह तो परम सौभाग्य को बात है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 926,925