# लिय फाँसी गले महँ डार, अब का सोच करे।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-1005-M21-K018
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: प्रकीर्ण-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 18
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 481–482

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>लिय फाँसी गले महँ डार, अब का सोच करे।  
<a id="line-2"></a>हौं प्रथमहिं तोहिं बरज्यों आली,  
<a id="line-3"></a>बचियो छल छलिया वनमाली।  
<a id="line-4"></a>नहिं मानी करन गई प्यार, अब का सोच करे।  
<a id="line-5"></a>तू घर की रही न घाट कि त्यों,  
<a id="line-6"></a>चूल्हे की हाँडी काठ कि ज्यों।  
<a id="line-7"></a>जो होनी थी हो गई यार, अब का सोच करे।  
<a id="line-8"></a>अब तो है संगिनि एक तेरी,  
<a id="line-9"></a>बस हाय-हाय दिखराय एरी।  
<a id="line-10"></a>हरि कै गयो बंटाढार, अब का सोच करे।  
<a id="line-11"></a>जब ओखलि में सखि! सिर धरना,  
<a id="line-12"></a>तो चोट ते काहे को डरना।  
<a id="line-13"></a>येहि यारी “कृपालु” बलिहार, अब का सोच करे॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

अरी सखि! जब तूने अपने हाथ से अपने गले में फासी डाल ली तो अब क्यों पछताती है। मैंने तुझे पहले ही रोका था कि उस छलिया के छल से बची रहना। तूने मेरी बात नहीं मानी और प्यार करने के लिए गयी, तब फिर अब क्यो पछताती है। अरी सखि! अब तो तू चूल्हे पर चढ़ी हुई लकड की हाँडी के समान न घर की रही न घाट की रही किन्तु जे होना था सो हो गया, अब क्यों पछताती है। अरी सखि! अब तो मुझे तेरी एक ही संगिनि बस "हाय, हाय'करना, यही दिखाई पड़ती है। श्यामसुन्दर बंटाढार कर गये, अब क्यो पछताती है। अरी सखि! जब कोई ओखली में सिर रख ले तो उसे चोट से नहीं डरना चाहिए। 'कृपालु' कहते हैं कि हम र जीवात्मा एवं परमात्मा के दिव्य प्रेम पर बलिहार जाते हैं इसमें पछताने की क्या आवश्यकता है, यह तो परम सौभाग्य को बात है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 926,925

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
