प्रकीर्ण-माधुरी · पद 17
मोहिं लीनो मोल बिनु दाम री, कामरी-वारे ने।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: mohiṁ līno mola binu dāma rī, kāmarī-vāre ne
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1मोहिं लीनो मोल बिनु दाम री, कामरी-वारे ने।
2दधि-बेचन इक दिन जात रही,
3नटखट ने अटपट बात कही।
4"टुक सुन तो सों कछु काम री,"कामरी-वारे ने।
5हौं बोलीं"काम बता अपनो"
6बोल्यो"निशि देख्यों इक सपनो।
7तू मेरी मैं तेरो ब्रज-बाम री", कामरी वारे ने।
8बोली"नटखट लंपट चलु हट",
9"तू भी कछु कम नहिं"कह लंपट।
10"दे गारी पियहिं लै नाम री,"कामरी-वारे ने।
11हौं बोली"सुन ले कान खोल,
12तू सब हीं ऐसेहिं कहत डोल।
13तेरी बात न दाम छदाम री", कामरी-वारे ने।
14बोल्यो"तू तो ह्वै गइ मोरी,
15मोहिं मान न निज इच्छा तोरी"।
16सुनि वारी “कृपालु” हौं भाम री, कामरी-वारे ने॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखी कहती है-अरी सखि! कामरी ओढ्ने वाले ने मुझे बिना मूल्य के ही मोल ले लिया है। एक दिन दही बेचने जा रही थी। मार्ग में उस नटखर ने एक अटपटी बात कही। उसने पुकार कर कहा-अरी सखि! जरा सुन ले, तुझसे कुछ काम है। मैंने कहा क्या काम है? उसने कहा, 'रात में। हमने एक सपना देखा है कि तू मेरी हो गई, मैं तेरा हो गया। 'मैंने कहा, 'अरे निर्लज्ज चल दूर हट।'उसने कहा- तू भी निर्लज्ज है जो मुझ प्रियतम को नाम लेकर गाली दे रही है। मैंने कहा कान खोलकर सुन ले, तू सबसे ऐसा ही कहता फिरता है, तेरी बात का मूल्य एक छदाम भी नहीं है'। उसने कहा-'तू तो मेरी हो चुकी, तू मुझे अपना मान या न मान, यह तेरी इच्छा '। कृपालु' कहते हैं यह सुनते ही सखी श्यामसुन्दर पर न्यौछावर हो गई।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 928,927