# मोहिं लीनो मोल बिनु दाम री, कामरी-वारे ने।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-1004-M21-K017
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: प्रकीर्ण-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 17
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 480–481

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>मोहिं लीनो मोल बिनु दाम री, कामरी-वारे ने।  
<a id="line-2"></a>दधि-बेचन इक दिन जात रही,  
<a id="line-3"></a>नटखट ने अटपट बात कही।  
<a id="line-4"></a>"टुक सुन तो सों कछु काम री,"कामरी-वारे ने।  
<a id="line-5"></a>हौं बोलीं"काम बता अपनो"  
<a id="line-6"></a>बोल्यो"निशि देख्यों इक सपनो।  
<a id="line-7"></a>तू मेरी मैं तेरो ब्रज-बाम री", कामरी वारे ने।  
<a id="line-8"></a>बोली"नटखट लंपट चलु हट",  
<a id="line-9"></a>"तू भी कछु कम नहिं"कह लंपट।  
<a id="line-10"></a>"दे गारी पियहिं लै नाम री,"कामरी-वारे ने।  
<a id="line-11"></a>हौं बोली"सुन ले कान खोल,  
<a id="line-12"></a>तू सब हीं ऐसेहिं कहत डोल।  
<a id="line-13"></a>तेरी बात न दाम छदाम री", कामरी-वारे ने।  
<a id="line-14"></a>बोल्यो"तू तो ह्वै गइ मोरी,  
<a id="line-15"></a>मोहिं मान न निज इच्छा तोरी"।  
<a id="line-16"></a>सुनि वारी “कृपालु” हौं भाम री, कामरी-वारे ने॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक सखी कहती है-अरी सखि! कामरी ओढ्ने वाले ने मुझे बिना मूल्य के ही मोल ले लिया है। एक दिन दही बेचने जा रही थी। मार्ग में उस नटखर ने एक अटपटी बात कही। उसने पुकार कर कहा-अरी सखि! जरा सुन ले, तुझसे कुछ काम है। मैंने कहा क्या काम है? उसने कहा, 'रात में। हमने एक सपना देखा है कि तू मेरी हो गई, मैं तेरा हो गया। 'मैंने कहा, 'अरे निर्लज्ज चल दूर हट।'उसने कहा- तू भी निर्लज्ज है जो मुझ प्रियतम को नाम लेकर गाली दे रही है। मैंने कहा कान खोलकर सुन ले, तू सबसे ऐसा ही कहता फिरता है, तेरी बात का मूल्य एक छदाम भी नहीं है'। उसने कहा-'तू तो मेरी हो चुकी, तू मुझे अपना मान या न मान, यह तेरी इच्छा '। कृपालु' कहते हैं यह सुनते ही सखी श्यामसुन्दर पर न्यौछावर हो गई।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 928,927

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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