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RADHEY RADHEY

प्रकीर्ण-माधुरी · पद 19

श्यामसुन्दर सों करिके प्यार, रही नहिं कतहूँ की।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: shyāmasundara soṁ karike pyāra, rahī nahiṁ katahūṁ kī

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1श्यामसुन्दर सों करिके प्यार, रही नहिं कतहूँ की।

2इक दिन की बात कहूँ सजनी,

3कुछ शेष रही जब ही रजनी।

4नटखट, खटकाय किवार, रही नहिं कतहूँ की।

5बोली"खटकाय कपाट कौन?"

6कह कान्ह"आय मेहमान भौन।

7तेरे मैके को कोऊ पुकार", रही नहिं कतहूँ की।

8हौं झाँक्यों बाहर खोलि द्वार,

9तब कह"तेहि निज घर दिय बिठार"।

10चली साँची मानि तेहि द्वार, रही नहिं कतहूँ की।

11मग कहि"प्यारी"गर बाँह डार,

12बरबस सरबस गइ हमहुँ हार।

13कहूँ कासों “कृपालु” पिय जार, रही नहिं कतहूँ की॥

हिन्दी भावार्थ

एक सखी कहती है-अरी सखि! मैं श्यामसुन्दर से प्यार करके कहीं की न रही। एक दिन की बात बताऊँ, थोड़ी सी रात बाकी थी तभी उस नटखट ने किवाड़ खटखटाया। मैंने पूछा, कौन किवाड़ खटखटा रहा है? उसने कहा तेरे मायके से कोई मेहमान आया है, वही पुकार रहा है। मैंने दरवाजा खोलकर बाहर देखा, तब उसने कहा, 'मैंने उसे अपने घर पर बिठा दिया है।'मैं विशवास करके उसके साथ उसके घर चल म। मार्ग में उसने 'प्यारी 'कहकर मेरे गले में हाथ डाल दिया। न चाहते हुए भी मैं अपना सर्वस्व खो बैठी। 'कृपालु' के शब्दों में सखी कहती है, "परपुरुष के प्यार को अब भला मैं किससे कहूँ?

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 925,924