# श्यामसुन्दर सों करिके प्यार, रही नहिं कतहूँ की।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-1006-M21-K019
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: प्रकीर्ण-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 19
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 482–483

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>श्यामसुन्दर सों करिके प्यार, रही नहिं कतहूँ की।  
<a id="line-2"></a>इक दिन की बात कहूँ सजनी,  
<a id="line-3"></a>कुछ शेष रही जब ही रजनी।  
<a id="line-4"></a>नटखट, खटकाय किवार, रही नहिं कतहूँ की।  
<a id="line-5"></a>बोली"खटकाय कपाट कौन?"  
<a id="line-6"></a>कह कान्ह"आय मेहमान भौन।  
<a id="line-7"></a>तेरे मैके को कोऊ पुकार", रही नहिं कतहूँ की।  
<a id="line-8"></a>हौं झाँक्यों बाहर खोलि द्वार,  
<a id="line-9"></a>तब कह"तेहि निज घर दिय बिठार"।  
<a id="line-10"></a>चली साँची मानि तेहि द्वार, रही नहिं कतहूँ की।  
<a id="line-11"></a>मग कहि"प्यारी"गर बाँह डार,  
<a id="line-12"></a>बरबस सरबस गइ हमहुँ हार।  
<a id="line-13"></a>कहूँ कासों “कृपालु” पिय जार, रही नहिं कतहूँ की॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक सखी कहती है-अरी सखि! मैं श्यामसुन्दर से प्यार करके कहीं की न रही। एक दिन की बात बताऊँ, थोड़ी सी रात बाकी थी तभी उस नटखट ने किवाड़ खटखटाया। मैंने पूछा, कौन किवाड़ खटखटा रहा है? उसने कहा तेरे मायके से कोई मेहमान आया है, वही पुकार रहा है। मैंने दरवाजा खोलकर बाहर देखा, तब उसने कहा, 'मैंने उसे अपने घर पर बिठा दिया है।'मैं विशवास करके उसके साथ उसके घर चल म। मार्ग में उसने 'प्यारी 'कहकर मेरे गले में हाथ डाल दिया। न चाहते हुए भी मैं अपना सर्वस्व खो बैठी। 'कृपालु' के शब्दों में सखी कहती है, "परपुरुष के प्यार को अब भला मैं किससे कहूँ?

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 925,924

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
