प्रकीर्ण-माधुरी · पद 9
नन्ददुलारे, राधा जू के प्यारे, प्राण हमारे,
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: nandadulāre, rādhā jū ke pyāre, prāṇa hamāre,
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1नन्ददुलारे, राधा जू के प्यारे, प्राण हमारे,
2जाऊँ तिहारी बलिहार।
3सुन्दरताहूँ जासु लजाई,
4ललित त्रिभंगी छवि मो मन भाई।
5नैन रतनारे, मैन मदमारे, सैन मनहारे,
6छविनिधि नन्दकुमार।
7तरु-तमाल श्यामल-तनु धारी,
8राधा - मानस - हंस - मुरारी।
9कारे कारे, अति अनियारे, कच घुँघरारे,
10जनु अलि-पंक्ति अपार।
11मोर मुकुट सिर पेच विराजै,
12मृगमद-तिलक भाल छवि छाजै।
13गुंजमाल धारे, पीतपट वारे, पग अरुणारे,
14मृदु नूपुर झनकार।
15बेसर सुघर नासिका सोहै,
16लाल अधर लाली मन मोहै।
17ओ वंशीवारे, जन रखवारे, काहे बिसारे,
18ओर “कृपालु” निहार॥
हिन्दी भावार्थ
हे नन्दकुमार! हे राधारमण! हे प्राणेश्वर! मैं तुम्हारे बार-बार बलैया लेता हूँ। जिनके सौन्दर्य को देखकर सौन्दर भी लज्जित होता है, वह ग्रीवा-कटि-पद-भंगी वाली मनोह गा मेरे मन में बस गयी है। जिनकी आँखें अत्यन्त मतवाली, कामदेव के अभिमान को भी नष्ट करने वाली हैं एवं जिनकी आँखों की सैन मन को मोहित करने वाली है वे श्यामसुन्दर रूप की निधि हैं। जिनका शरीर तमाल-वृक्ष की तरह श्याम रंग का है, जो राधिका जी के मन रूपी सरोवर में हंस के समान निवास करते हैं, जिनके बाल अत्यन्त ही घने, काले एवं घुँघराले हैं, मानो भींरों की पंक्ति मुख की ओर जा रही हो, जिनके सिर पर मोर पंख का मुकुट शोभित हो रहा है, जिनके ललाट पर कस्तूरी का तिलक चमक रहा है, जो गुंजमाला धारण किये हुए हैं, जो पीताम्बर पहने हुए हैं। जिनके चरणों के तलुवे लाल-लाल हैं, जिनके चरणों में नूपुर की ध्वनि हो रही है, जिनकी नाक में सुन्दर बेसर सुशोभित है, जिनके अधरों की लालिमा किशोरी जी के मन को भी मोहित करने वाली है। इस प्रकार अनुपम छवि वाले, हाथ में मुरली लिए हुए, हे भक्तों को रक्षा करने वाले! तुमने मुझे क्यों भुला दिया? 'कृपालु' कहते हैं कि मेरी ओर भी कृपा दृष्टि करो।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 938,936