# नन्ददुलारे, राधा जू के प्यारे, प्राण हमारे,

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0996-M21-K009
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: प्रकीर्ण-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 9
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 473–474

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>नन्ददुलारे, राधा जू के प्यारे, प्राण हमारे,  
<a id="line-2"></a>जाऊँ तिहारी बलिहार।  
<a id="line-3"></a>सुन्दरताहूँ जासु लजाई,  
<a id="line-4"></a>ललित त्रिभंगी छवि मो मन भाई।  
<a id="line-5"></a>नैन रतनारे, मैन मदमारे, सैन मनहारे,  
<a id="line-6"></a>छविनिधि नन्दकुमार।  
<a id="line-7"></a>तरु-तमाल श्यामल-तनु धारी,  
<a id="line-8"></a>राधा - मानस - हंस - मुरारी।  
<a id="line-9"></a>कारे कारे, अति अनियारे, कच घुँघरारे,  
<a id="line-10"></a>जनु अलि-पंक्ति अपार।  
<a id="line-11"></a>मोर मुकुट सिर पेच विराजै,  
<a id="line-12"></a>मृगमद-तिलक भाल छवि छाजै।  
<a id="line-13"></a>गुंजमाल धारे, पीतपट वारे, पग अरुणारे,  
<a id="line-14"></a>मृदु नूपुर झनकार।  
<a id="line-15"></a>बेसर सुघर नासिका सोहै,  
<a id="line-16"></a>लाल अधर लाली मन मोहै।  
<a id="line-17"></a>ओ वंशीवारे, जन रखवारे, काहे बिसारे,  
<a id="line-18"></a>ओर “कृपालु” निहार॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हे नन्दकुमार! हे राधारमण! हे प्राणेश्वर! मैं तुम्हारे बार-बार बलैया लेता हूँ। जिनके सौन्दर्य को देखकर सौन्दर भी लज्जित होता है, वह ग्रीवा-कटि-पद-भंगी वाली मनोह गा मेरे मन में बस गयी है। जिनकी आँखें अत्यन्त मतवाली, कामदेव के अभिमान को भी नष्ट करने वाली हैं एवं जिनकी आँखों की सैन मन को मोहित करने वाली है वे श्यामसुन्दर रूप की निधि हैं। जिनका शरीर तमाल-वृक्ष की तरह श्याम रंग का है, जो राधिका जी के मन रूपी सरोवर में हंस के समान निवास करते हैं, जिनके बाल अत्यन्त ही घने, काले एवं घुँघराले हैं, मानो भींरों की पंक्ति मुख की ओर जा रही हो, जिनके सिर पर मोर पंख का मुकुट शोभित हो रहा है, जिनके ललाट पर कस्तूरी का तिलक चमक रहा है, जो गुंजमाला धारण किये हुए हैं, जो पीताम्बर पहने हुए हैं। जिनके चरणों के तलुवे लाल-लाल हैं, जिनके चरणों में नूपुर की ध्वनि हो रही है, जिनकी नाक में सुन्दर बेसर सुशोभित है, जिनके अधरों की लालिमा किशोरी जी के मन को भी मोहित करने वाली है। इस प्रकार अनुपम छवि वाले, हाथ में मुरली लिए हुए, हे भक्तों को रक्षा करने वाले! तुमने मुझे क्यों भुला दिया? 'कृपालु' कहते हैं कि मेरी ओर भी कृपा दृष्टि करो।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 938,936

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
