प्रकीर्ण-माधुरी · पद 8
नथवारी तिहारी बलिहार, प्यारी छवि का कहनो।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: nathavārī tihārī balihāra, pyārī chhavi kā kahano
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1नथवारी तिहारी बलिहार, प्यारी छवि का कहनो।
2बहुरंगी-मुकुट-मणिन झाँकी,
3तापर लर-मोतिन छवि बाँकी,
4गुँथि वेणी फुलन श्रृंगार, प्यारी छवि का कहनो।
5मनहरन दुहुँन श्रुति करनफूल,
6नासा नथ-बेसर झुकी झूल,
7लर-मोतिन की अजब बहार, प्यारी छवि का कहनो।
8अँखियाँ मधु-विष-पीयूष घुरी,
9मृदु हँसनि दशन-दुति जनु बिजुरी,
10गर मोतिन मणिन को हार, प्यारी छवि का कहनो।
11मणि-कंकन कर करपत्र चुरी,
12मुँदरिन मनि दुति दामिनि जनु री,
13रची मेहँदी सुघर अरुणार, प्यारी छवि का कहनो।
14गोरे तनु सोहैं नील-वसन,
15कटि कनक-किंकिनिन धुनि छननन,
16भल पायल की धुनि झनकार, प्यारी छवि का कहनो।
17छवि अरुण-मिहावरि अति प्यारी,
18पग अँगुरिन बिछुवनि छवि न्यारी,
19अलबेली “कृपालु” सरकार, प्यारी छवि का कहनो॥
हिन्दी भावार्थ
वृषभानुदुलारी! मैं तुम पर बलिहार जाती हूँ, तुम्हारी मनोहर छवि अनिर्वचनीय है। रंग-बिरंगी मणियों से अलंकृत मुकुट एवं उस पर मोतियों की लड़ की झाँकी अत्यन्त ही बाँकी है। तुम्हारी गुथी हुई वेणी में फूलों का शृंगार अत्यन्त ही कमनीय है। दोनों कानों में मनोहर कर्णफूल, नासिका में नथ एवं बेसर का झुक-झुक कर झूलना तथा मोतियों की लड़ों की बहार देखते ही बनती है। तुम्हारी आँखों में मदिरा, विष एवं अमृत घुला हुआ है। तुम्हारे मन्द-मन्द हँसने पर दाँतों की चमक बिजली के समान चमकती है। तुम्हारे गले में मोतियों मणियों का हार सुशोभित है। हाथ में मणियों के कंकण एवं चूड़याँ अलंकृत हैं। अंगुलियों में अंगूठियों में जड़ी मणियों की कान्ति बिजली की तरह चमक रही है। हाथ में लाल मेहँदी, क्या ही सुन्दर सुवर्ण की किंकिणी की धुनि अत्यन्त मनोहारिणी है। चरणों में पायल की झनकार का क्या कहना है! लाल मिहावर का सौन्दर्य अनुपमेय है। पैर की अंगुलियों ड बिछुओं की छवि निराली है। 'कृपालु' कहते हैं कि हमारी सरकार अलबेली हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 940,939,938