प्रकीर्ण-माधुरी · पद 7
तू भोरी भारी वारी-वारी जाय री, वारी बनवारी पै।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: tū bhorī-bhārī vārī-vārī jāya rī, vārī banavārī pai
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1तू भोरी भारी वारी-वारी जाय री, वारी बनवारी पै।
2नहिं जानति तू अलि! या छलिया,
3बस आग लगावन जान पिया,
4नहिं जानत वाय बुझाय री, वारी बनवारी पै।
5जो मैया-बापन नाहिं भयो,
6तजि बंदीगृह तिन भाजि गयो,
7तू कैसे वाय पतियाय री, वारी बनवारी पै।
8वाको छल-कपट निधान जान,
9सब सोइ कह"अर्पित तोहिं प्रान",
10भये पलक ओट बिसराय री, वारी बनवारी पै।
11सखि कह"यह हौंहूँ नीक जान,
12यह मन सखि! तबहूँ नाहिं मान,
13हौं हारी याय समुझाय री", वारी बनवारी पै।
14यह अचरज देखु सखी कैसो,
15अवगुन लखिहूँ मन रम ऐसो,
16कह चिन्मय “कृपालु” बलभाय री, वारी बनवारी पै॥
हिन्दी भावार्थ
न सखी दूसरी सखी से कहती है-अरी सखि! तू बड़ी भोली है जो उस छलिया श्यामसुन्दर पर न्यौछावर हुई जा रही है। अरी सखि! तू उस छलिया को नहीं जानती वह बस आग लगाना ही जानता है, उसे बुझाना नहीं जानता। अरी सखि! जो अपने माँ-बाप का नहीं हुआ, उनको जेल में छोड़कर भाग आया, तू भला ऐसे कपटी पर कैसे विश्वास करती है? अरी सखि! उसको छल कपट का शिरोमणि समझ वह सबसे ऐसा ही कहता है कि तुझे तो मेरा प्राण समर्पित है और पलक-ओट होते ही भुला देता है। सखी ने कहा-तू जो कह रही है इसे मैं भली-भाँति जानती हूँ, किन्तु क्या करूँ। तब भी मन नहीं मानता। मैं इसे समझा कर हार गयी। अरी सखि! यह कैसा आश्चर्य है कि प्रियतम के दोषों को देखते हुए भी मन बरबस उन्हीं के बश में है। 'कृपालु' कहते हैं-अरी सखि! श्यामसुन्दर चिन्मय हैं अतएव इसमें आश्चर्य नहीं है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 941,940