प्रकीर्ण-माधुरी · पद 6
तू भाये, तेरी प्रीति न भाये पिय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: tū bhāye, terī prīti na bhāye piya!
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1तू भाये, तेरी प्रीति न भाये पिय।
2अंग-अंग छवि कोटि अनंगनि,
3लोचन पुनि-पुनि लखि न अघाये पिय।
4चितवनि मधुर-मधुर मृदु मुसकनि,
5कोटिन प्रान वारि सुख पाये पिय।
6मत्त-गजेन्द्र गवनि का कहनो,
7लखतहिं बनत, न बनत बताये पिय।
8भूलत प्रान अपान तान सुनि,
9मुरलि अधर-धर जबहिं बजाये पिय।
10पै “कृपालु” मग जब कहि"प्यारी",
11उर लगाय यह, समुझि न आये पिय॥
हिन्दी भावार्थ
हे प्रियतम श्यामसुन्दर! तुम तो मुझे बहुत अच्छे लगते हो किन्तु तुम्हारा प्यार बिल्कुल अच्छा नहीं लगता तुम्हारे एक-एक अंग के सौन्दर्य पर अनन्त कामदेव का सौन्दय न्यौछावर है। आँखें बार-बार देखकर भी तृप्त नहीं होती तुम्हारी मधुर विलोकनि एवं मधुर-मुस्कान को देखकर ते इतना सुख मिलता है कि करोड़ों प्राण न्यौछावर कर देती हूँ बनैले मतवाले हाथी के समान तुम्हारी मतवाली चाल का ते कहना ही क्या है। बस देखते ही बनती है, बताई नहीं जाती। और जब तुम मनोहर मुरली को अधर पर धर कर बजाते हो तब उस सुरीली तान को सुनकर प्राण-अपान की सुध भूल जाती है। 'कृपालु' कहते हैं कि यह सब तो ठीक है किन्तु जब तुम मार्ग में 'प्यारी'कह कर बेधड़क हृदय से लगा लेते हो, यह तुम्हारा लोक-विरुद्ध व्यबहार समझ में नहीं आता।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 942,941