प्रकीर्ण-माधुरी · पद 5
छुवो जनि प्यारे!, मोहिं डर लागे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: chhuvo jani pyāre!, mohiṁ ḍara lāge
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1छुवो जनि प्यारे!, मोहिं डर लागे।
2हौंहूँ अहौं कुँवारि, तुमहुँ तो, हौ पुनि क्वाँरे।
3बात फैलि जैहैं दिन द्वै में, मुरलीवारे।
4गगन चन्द्र कहुँ छुपि न सके इमि, हाथ पसारे।
5प्यार करहु दूरहिं ते, नहिं तो, लगि हैं नारे।
6लोक वेद बाधक “कृपालु” इन, मुँह न लगा रे॥
हिन्दी भावार्थ
एक ब्रजांगना प्रेम लपेटी अटपटी भाषा में कहती है कि हे प्रियतम श्यामसुन्दर! मेरे शरीर को मत छुओ, मुझे डर लगता है। मैं अभी अविवाहिता हूँ और फिर तुम भी अविवाहित हो। हे मुरली मनोहर! यह बात छिप नहीं सकती, दो दिन में ही सर्वत्र फैल जायगी जैसे आकाश में चन्द्रमा को कोई हाथ फैलाकर नहीं छिपा सकता। इसलिए हे प्रियतम! दूर से ही प्यार करो, नहीं तो लोग अश्लील नारे लगाने लगेंगे। इतने में ही 'कृपालु' ने कहा कि अरी सखि! तू लोक वेद की मर्यादा के चक्कर में क्यों पड़ती है, ये तो प्रेम में बाधक हैं, अतएव इनको अधिक मुँह लगाना ठीक नहीं है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 943,942