प्रकीर्ण-माधुरी · पद 4
करन लागे मोहन अब चोरी।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: karana lāge mohana aba chorī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1करन लागे मोहन अब चोरी।
2परम स्वतंत्र न डर काहू सों, सब सों बरजोरी।
3मास-पिंड नहिं लोग कह, गुण विहीन इन देह।
4कूट कूट कर कूट बुधि, भरी मरम सखि! एह।
5धूत करतूतहिं सुनु गोरी।।
6सोती थी मैं एक दिन, करके बन्द किवार।
7ना जाने कित सों धँस्यो, भोरेहिं नन्दकुमार।
8जगाई मोको झकझोरी।।
9उठी तमकि बोली"अरे!, रैनिहुँ नींद न तोय"।
10अरी! तोय टेरति सखी, खरी पौरिया कोय"।
11गई मैं देखन को दोरी।।
12हेला देत उतै थकी, लखी न कोऊ द्वार।
13लखी इतै नवनीत हरि, खात दुहुँन कर डार।
14देखि मोहिं मटुकीहूँ फोरी।।
15दौरि पकरि कर लै चली, यशुमति ढिंग रिस लाग।
16टेरि कही लखु लाल के, गुन माखन मुख दाग।
17न मानति तू कबहूँ भोरी॥
18अरी वीर! पुनि का कहूँ, सो जादूगर राय।
19मम “कृपालु” पति-रूप धर, मैं अति गई लजाय।
20भजी मैं हँसी भई मोरी॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखी अपनी अन्तरंग सखी से कहती है कि अरी सखी! नंद का लाला तो अब चोरी करना भी सीख गया है, उसको कोई रोकने वाला नहीं है, न वह किसी से डरता है। सदा ही बरबस सबसे बरजोरी करता रहता है। अरी सखी! महात्मा लोगों से सुना है कि उसकी देह में वास्तव में रक्त- मांस आदि नहीं है वरन् उसकी देह तो गुणहीन है। मेरी समझ में तो छल-कपट से भरी हुई बुद्धि होने के कारण ही उसे गुणहीन अर्थात् अवगुणों से युक्त कहा है। अरी सखी! सुन, मैं उसकी धूर्तता सुनाती हूँ। एक दिन मैं चारों ओर से किवाड़ बन्द करके सो रही थी पर वह जादूगर न जाने किधर से भीतर घुस आया और मुझे झकझोरते हुए जगा दिया। नींद पूरी न होने के कारण मैं बड़े क्रोध में उठ कर बोली, 'अरे छलिया! क्या तुझे रात में भी नींद नहीं आती?'तब उसने कहा, 'अरी सखी! तेरे द्वार पर खड़ी हुई बड़ी देर से तेरी कोई सखी तुझे बुला रही है, इसलिए तुझे मैंने जगाया है।'उसके कहने पर विश्वास करके मैं उस सखी को द्वार पर देखने गयी। द्वार पर पुकारते-पुकारते थक गयी किन्तु वहाँ जब कोई सखी हो तब तो बोले। मैं खीझकर जब वापस लौटी तब क्या देखा कि वह छलिया दोनों हाथों से मक्खन निकाल-निकालकर खा रहा है। मुझे देखते ही उसने मटकी भी गिराकर फोड़ दी। तब तो मैं अत्यन्त ही क्रुद्ध होकर तत्क्षण ही उसे पकड़कर यशोदा के. ले गयी और यशोदा से कहा कि अपने लाला के गुण देख लो। मुख में मक्खन लगा हुआ देखकर भी क्या अब विशवास न करोगी? हे यशोदाजी! तुम अत्यन्त ही भोली हो जो आज तक हमारी बातों को नहीं मानती थी। "कृपालु"कहते हैं अरी सखी! फिर क्या बताऊँ वह जादूगरों का सम्राट, मेरा पति बन गया और मैंने जब मुड़कर देखा तो मैं लाज के मारे हाथ छोड़कर भाग खड़ी हुई। सारे गाँव में मेरी हँसी उड़ी।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 945,944,943