# करन लागे मोहन अब चोरी।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0991-M21-K004
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: प्रकीर्ण-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 4
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 469–470

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>करन लागे मोहन अब चोरी।  
<a id="line-2"></a>परम स्वतंत्र न डर काहू सों, सब सों बरजोरी।  
<a id="line-3"></a>मास-पिंड नहिं लोग कह, गुण विहीन इन देह।  
<a id="line-4"></a>कूट कूट कर कूट बुधि, भरी मरम सखि! एह।  
<a id="line-5"></a>धूत करतूतहिं सुनु गोरी।।  
<a id="line-6"></a>सोती थी मैं एक दिन, करके बन्द किवार।  
<a id="line-7"></a>ना जाने कित सों धँस्यो, भोरेहिं नन्दकुमार।  
<a id="line-8"></a>जगाई मोको झकझोरी।।  
<a id="line-9"></a>उठी तमकि बोली"अरे!, रैनिहुँ नींद न तोय"।  
<a id="line-10"></a>अरी! तोय टेरति सखी, खरी पौरिया कोय"।  
<a id="line-11"></a>गई मैं देखन को दोरी।।  
<a id="line-12"></a>हेला देत उतै थकी, लखी न कोऊ द्वार।  
<a id="line-13"></a>लखी इतै नवनीत हरि, खात दुहुँन कर डार।  
<a id="line-14"></a>देखि मोहिं मटुकीहूँ फोरी।।  
<a id="line-15"></a>दौरि पकरि कर लै चली, यशुमति ढिंग रिस लाग।  
<a id="line-16"></a>टेरि कही लखु लाल के, गुन माखन मुख दाग।  
<a id="line-17"></a>न मानति तू कबहूँ भोरी॥  
<a id="line-18"></a>अरी वीर! पुनि का कहूँ, सो जादूगर राय।  
<a id="line-19"></a>मम “कृपालु” पति-रूप धर, मैं अति गई लजाय।  
<a id="line-20"></a>भजी मैं हँसी भई मोरी॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक सखी अपनी अन्तरंग सखी से कहती है कि अरी सखी! नंद का लाला तो अब चोरी करना भी सीख गया है, उसको कोई रोकने वाला नहीं है, न वह किसी से डरता है। सदा ही बरबस सबसे बरजोरी करता रहता है। अरी सखी! महात्मा लोगों से सुना है कि उसकी देह में वास्तव में रक्त- मांस आदि नहीं है वरन् उसकी देह तो गुणहीन है। मेरी समझ में तो छल-कपट से भरी हुई बुद्धि होने के कारण ही उसे गुणहीन अर्थात् अवगुणों से युक्त कहा है। अरी सखी! सुन, मैं उसकी धूर्तता सुनाती हूँ। एक दिन मैं चारों ओर से किवाड़ बन्द करके सो रही थी पर वह जादूगर न जाने किधर से भीतर घुस आया और मुझे झकझोरते हुए जगा दिया। नींद पूरी न होने के कारण मैं बड़े क्रोध में उठ कर बोली, 'अरे छलिया! क्या तुझे रात में भी नींद नहीं आती?'तब उसने कहा, 'अरी सखी! तेरे द्वार पर खड़ी हुई बड़ी देर से तेरी कोई सखी तुझे बुला रही है, इसलिए तुझे मैंने जगाया है।'उसके कहने पर विश्वास करके मैं उस सखी को द्वार पर देखने गयी। द्वार पर पुकारते-पुकारते थक गयी किन्तु वहाँ जब कोई सखी हो तब तो बोले। मैं खीझकर जब वापस लौटी तब क्या देखा कि वह छलिया दोनों हाथों से मक्खन निकाल-निकालकर खा रहा है। मुझे देखते ही उसने मटकी भी गिराकर फोड़ दी। तब तो मैं अत्यन्त ही क्रुद्ध होकर तत्क्षण ही उसे पकड़कर यशोदा के. ले गयी और यशोदा से कहा कि अपने लाला के गुण देख लो। मुख में मक्खन लगा हुआ देखकर भी क्या अब विशवास न करोगी? हे यशोदाजी! तुम अत्यन्त ही भोली हो जो आज तक हमारी बातों को नहीं मानती थी। "कृपालु"कहते हैं अरी सखी! फिर क्या बताऊँ वह जादूगरों का सम्राट, मेरा पति बन गया और मैंने जब मुड़कर देखा तो मैं लाज के मारे हाथ छोड़कर भाग खड़ी हुई। सारे गाँव में मेरी हँसी उड़ी।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 945,944,943

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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