प्रकीर्ण-माधुरी · पद 3
ओरे तोरे मन कपट खटाई री, जा जारे जारे हरजाई।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ore tore mana kapaṭa khaṭāī rī, jā jāre jāre harajāī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1ओरे तोरे मन कपट खटाई री, जा जारे जारे हरजाई।
2मोते कह, तुम मम प्रान-प्रान, बिनु प्रान न रहि सक कान्ह मान,
3इमि बातन मोहिं, भुराई री, जा जारे जारे हरजाई।
4टुक दर्पन लै लखु दृगन लाल, भल लाग मिहावरि भाल लाल,
5काउ लइ चरनन शरनाई री, जा जारे जारे हरजाई।
6कह कान्ह"सुनहु मानिनि मोरी, जाग्यो सब रैन सुरति तोरी,
7सोइ नैनन आई अरुणाई री,"जा जारे जारे हरजाई।
8"तव प्रणय-हेतु पूज्यो गिरिवर, रोयो सिर धरि गिरिवर पग पर,
9सोइ भाल “कृपालु” ललाई री,"जा जारे जारे हरजाई॥
हिन्दी भावार्थ
(रति-रस चिह्नों से युक्त श्यामसुन्दर को देखकर किशोरी जी कहती हैं-) अरे हरजाई! तेरे मन में कपट भरा है, अतएव तू मेरे पास से चला जा। तू मुझसे कहता है कि तुम मेरी प्राण की प्राण हो, बिना प्राण के मैं नहीं रह सकता, इस प्रकार चिकनी चुपड़ी बातों से मुझे भुलावा देता है। जरा शीशा लेकर अपनी लाल- लाल आँखें तो देख और फिर ललाट में लगी हुई लाल-लाल मिहावर तो देख! स्पष्ट है कि किसी सखी की शरणागति ग्रहण की है। श्यामसुन्दर ने कहा-हे मानिनीजी! मेरी भी तो सुन लो। तुम्हारी स्मृति में ही सारी रात जागा हूँ, इसलिये आँखों में ललाई छा गई है। तुम्हारी प्रसन्नता के लिए गोवर्धन की पूजा की थी एवं गिरिराज महाराज के चरणों में सिर रखकर रोया था। 'कृपालु' कहते हैं कि ललाट में वही गुलाल की ललाई है। शंका की कोई बात नहीं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 946,945