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RADHEY RADHEY

प्रकीर्ण-माधुरी · पद 2

अलबेलो हमारो यार, प्रेम के बंधन में।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: alabelo hamāro yāra, prema ke bandhana meṁ

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1अलबेलो हमारो यार, प्रेम के बंधन में।

2नहिं जात समाधिन जोगिन जेइ,

3नाचत ता थेइ, ता थेइ-थेइ तेइ,

4ब्रजनारिन कि तारिन कि तार, प्रेम के बंधन में।

5नित खोजत वेद ऋचान जेई,

6बनि यशुमति के सुत कान्ह तेई,

7बँधे ऊखल में लेहु निहार, प्रेम के बंधन में।

8ब्रह्माण्ड अनन्तहिं पाल जेई,

9छोरत मुख कौरहिं ग्वाल तेई,

10बने घोड़ा गँवारन ग्वार, प्रेम के बंधन में।

11अग जग सब जग संहारक जेइ,

12डरपत यशुमति की साँटिन तेइ,

13धनि लीला “कृपालु” सरकार, प्रेम के बंधन में॥

हिन्दी भावार्थ

हमारे रसिक शिरोमणि प्रियतम श्यामसुन्दर प्रेम के बंधन में बँधे हुए हैं। जो योगियों की समाधि में भी नहीं जाते, वे ही ब्रजांगनाओं के हाथ की तालियों पर ता-थेइ-थेइ करते हुए नाचते हैं। अरी सखि! प्रेम के बंधन में वे ऐसे बँध जाते हैं कि जिनको निरन्तर वेद की ऋचाएँ खोजा करती हैं, वे ही यशोदानन्दन कान्ह बनकर ऊखल में बँध जाते हैं। प्रेम का बंधन ऐसा है कि जो अनन्त कोटि ब्रह्माण्डों का पालन करता है वही ग्वालों के मुख से ग्रास छीन-छीनकर खाता है एवं खेल में गँवार ग्वालों का घोड़ा बनता है। अरी सखि! वे तो प्रेम के बंधन में बँधे हैं। जो स्थावर-जंगम सबका संहार करते हैं, वे ही यशोदा मैया के डंडे से डरते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि मैं अलबेली सरकार की लीला पर बलिहार जाता हूँ क्योंकि वे प्रेम के बंधन में बँधकर मधुरातिमधुर एवं परम विलक्षण लीलाएँ करते हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 947,946