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RADHEY RADHEY

प्रकीर्ण-माधुरी · पद 1

अपनापन रखना, मेरे घनश्याम।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: apanāpana rakhanā, mere ghanashyāma

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1अपनापन रखना, मेरे घनश्याम।

2घड़ी-घड़ी पल-पल नाम तिहारो,

3रटे मेरी रसना मेरे घनश्याम।

4लली-लाल दोउ दै गरबाहीं,

5हमारे हिये बसना, मेरे घनश्याम।

6भाव-हिंडोरे डारि हिये में,

7झुलावूँ नित झुलना, मेरे घनश्याम।

8दै उपहार हार अँसुवन को,

9बना लूँ तुझे अपना, मेरे घनश्याम।

10कैसेहुँ करि “कृपालु” प्रभु अपनो,

11पुरवो मम सपना, मेरे घनश्याम॥

हिन्दी भावार्थ

हे मेरे श्यामसुन्दर! अपने अकारण करुण विरद की सदा ही रक्षा करना अथवा हे मेरे श्यामसुन्दर! तुम मुझे सदा ही अपना समझना। हे श्यामसुन्दर! मेरी यही कामना है कि मेरी जिह्वा प्रत्येक क्षण तुम्हारे नामों की रटना लगाया करे। हे श्यामसुन्दर! हे वृषभानुनन्दिनी! तुम दोनों गले में हाथ डाले हुए हमारे हृदय में नित्य ही निवास करना। हृदय में विविध भावों के झूले में मैं तुम दोनों को नित्य ही झुलाया करूँ एवं आँसुओं की माला की भेंट देकर मैं तुमको सदा के लिए अपना बना लूँ। 'कृपालु' कहते हैं कि हे श्यामसुन्दर! किसी भी प्रकार से मुझको अपना बनाकर मेरी इस कामना को पूर्ण करो।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 919,947