# अलबेलो हमारो यार, प्रेम के बंधन में।

स्थायी पृष्ठ: https://radhey.shreyam1008.com.np/prem-ras-madira/pad/prm-0989-m21-k002/
भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0989-M21-K002
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: प्रकीर्ण-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 2
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 467–468

[English](https://radhey.shreyam1008.com.np/en/prem-ras-madira/pad/prm-0989-m21-k002/) · [पुस्तक की अनुक्रमणिका](https://radhey.shreyam1008.com.np/prem-ras-madira/) · [दोनों भाषाओं में पुस्तक पढ़ें](https://radhey.shreyam1008.com.np/PRM/?pad=989&mode=reader&lang=both) · [दोनों भाषाओं का स्रोत पाठ](https://radhey.shreyam1008.com.np/content/prm/prm-0989-m21-k002.md)

## मूल पद

<a id="line-1"></a>अलबेलो हमारो यार, प्रेम के बंधन में।  
<a id="line-2"></a>नहिं जात समाधिन जोगिन जेइ,  
<a id="line-3"></a>नाचत ता थेइ, ता थेइ-थेइ तेइ,  
<a id="line-4"></a>ब्रजनारिन कि तारिन कि तार, प्रेम के बंधन में।  
<a id="line-5"></a>नित खोजत वेद ऋचान जेई,  
<a id="line-6"></a>बनि यशुमति के सुत कान्ह तेई,  
<a id="line-7"></a>बँधे ऊखल में लेहु निहार, प्रेम के बंधन में।  
<a id="line-8"></a>ब्रह्माण्ड अनन्तहिं पाल जेई,  
<a id="line-9"></a>छोरत मुख कौरहिं ग्वाल तेई,  
<a id="line-10"></a>बने घोड़ा गँवारन ग्वार, प्रेम के बंधन में।  
<a id="line-11"></a>अग जग सब जग संहारक जेइ,  
<a id="line-12"></a>डरपत यशुमति की साँटिन तेइ,  
<a id="line-13"></a>धनि लीला “कृपालु” सरकार, प्रेम के बंधन में॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हमारे रसिक शिरोमणि प्रियतम श्यामसुन्दर प्रेम के बंधन में बँधे हुए हैं। जो योगियों की समाधि में भी नहीं जाते, वे ही ब्रजांगनाओं के हाथ की तालियों पर ता-थेइ-थेइ करते हुए नाचते हैं। अरी सखि! प्रेम के बंधन में वे ऐसे बँध जाते हैं कि जिनको निरन्तर वेद की ऋचाएँ खोजा करती हैं, वे ही यशोदानन्दन कान्ह बनकर ऊखल में बँध जाते हैं। प्रेम का बंधन ऐसा है कि जो अनन्त कोटि ब्रह्माण्डों का पालन करता है वही ग्वालों के मुख से ग्रास छीन-छीनकर खाता है एवं खेल में गँवार ग्वालों का घोड़ा बनता है। अरी सखि! वे तो प्रेम के बंधन में बँधे हैं। जो स्थावर-जंगम सबका संहार करते हैं, वे ही यशोदा मैया के डंडे से डरते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि मैं अलबेली सरकार की लीला पर बलिहार जाता हूँ क्योंकि वे प्रेम के बंधन में बँधकर मधुरातिमधुर एवं परम विलक्षण लीलाएँ करते हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 947,946

[पिछला पद](https://radhey.shreyam1008.com.np/prem-ras-madira/pad/prm-0988-m21-k001/) · [अगला पद](https://radhey.shreyam1008.com.np/prem-ras-madira/pad/prm-0990-m21-k003/)

## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

यह अनौपचारिक, व्यक्तिगत और आंशिक संग्रह है।

मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

- [आधिकारिक पूर्ण साहित्य संग्रह](https://www.jkpliterature.org.in/)
- [लेखक का आधिकारिक परिचय](https://jagadgurukripalujimaharaj.org.in/)
- [प्रेम रस मदिरा: आधिकारिक पुस्तक विवरण](https://www.jkpliterature.org.in/products/prem-ras-madira-regular-size)
- [संस्करण और स्रोत प्रमाण](https://radhey.shreyam1008.com.np/content/provenance.json)
- [पुस्तकालय के आवरणों का स्रोत विवरण](https://radhey.shreyam1008.com.np/content/books/index.json)
- [स्रोत और पाठ-सुधार](https://radhey.shreyam1008.com.np/collection/)

मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
