# ओरे तोरे मन कपट खटाई री, जा जारे जारे हरजाई।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0990-M21-K003
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: प्रकीर्ण-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 3
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 468–469

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>ओरे तोरे मन कपट खटाई री, जा जारे जारे हरजाई।  
<a id="line-2"></a>मोते कह, तुम मम प्रान-प्रान, बिनु प्रान न रहि सक कान्ह मान,  
<a id="line-3"></a>इमि बातन मोहिं, भुराई री, जा जारे जारे हरजाई।  
<a id="line-4"></a>टुक दर्पन लै लखु दृगन लाल, भल लाग मिहावरि भाल लाल,  
<a id="line-5"></a>काउ लइ चरनन शरनाई री, जा जारे जारे हरजाई।  
<a id="line-6"></a>कह कान्ह"सुनहु मानिनि मोरी, जाग्यो सब रैन सुरति तोरी,  
<a id="line-7"></a>सोइ नैनन आई अरुणाई री,"जा जारे जारे हरजाई।  
<a id="line-8"></a>"तव प्रणय-हेतु पूज्यो गिरिवर, रोयो सिर धरि गिरिवर पग पर,  
<a id="line-9"></a>सोइ भाल “कृपालु” ललाई री,"जा जारे जारे हरजाई॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(रति-रस चिह्नों से युक्त श्यामसुन्दर को देखकर किशोरी जी कहती हैं-) अरे हरजाई! तेरे मन में कपट भरा है, अतएव तू मेरे पास से चला जा। तू मुझसे कहता है कि तुम मेरी प्राण की प्राण हो, बिना प्राण के मैं नहीं रह सकता, इस प्रकार चिकनी चुपड़ी बातों से मुझे भुलावा देता है। जरा शीशा लेकर अपनी लाल- लाल आँखें तो देख और फिर ललाट में लगी हुई लाल-लाल मिहावर तो देख! स्पष्ट है कि किसी सखी की शरणागति ग्रहण की है। श्यामसुन्दर ने कहा-हे मानिनीजी! मेरी भी तो सुन लो। तुम्हारी स्मृति में ही सारी रात जागा हूँ, इसलिये आँखों में ललाई छा गई है। तुम्हारी प्रसन्नता के लिए गोवर्धन की पूजा की थी एवं गिरिराज महाराज के चरणों में सिर रखकर रोया था। 'कृपालु' कहते हैं कि ललाट में वही गुलाल की ललाई है। शंका की कोई बात नहीं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 946,945

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
