# तू भोरी भारी वारी-वारी जाय री, वारी बनवारी पै।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0994-M21-K007
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: प्रकीर्ण-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 7
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 471–472

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>तू भोरी भारी वारी-वारी जाय री, वारी बनवारी पै।  
<a id="line-2"></a>नहिं जानति तू अलि! या छलिया,  
<a id="line-3"></a>बस आग लगावन जान पिया,  
<a id="line-4"></a>नहिं जानत वाय बुझाय री, वारी बनवारी पै।  
<a id="line-5"></a>जो मैया-बापन नाहिं भयो,  
<a id="line-6"></a>तजि बंदीगृह तिन भाजि गयो,  
<a id="line-7"></a>तू कैसे वाय पतियाय री, वारी बनवारी पै।  
<a id="line-8"></a>वाको छल-कपट निधान जान,  
<a id="line-9"></a>सब सोइ कह"अर्पित तोहिं प्रान",  
<a id="line-10"></a>भये पलक ओट बिसराय री, वारी बनवारी पै।  
<a id="line-11"></a>सखि कह"यह हौंहूँ नीक जान,  
<a id="line-12"></a>यह मन सखि! तबहूँ नाहिं मान,  
<a id="line-13"></a>हौं हारी याय समुझाय री", वारी बनवारी पै।  
<a id="line-14"></a>यह अचरज देखु सखी कैसो,  
<a id="line-15"></a>अवगुन लखिहूँ मन रम ऐसो,  
<a id="line-16"></a>कह चिन्मय “कृपालु” बलभाय री, वारी बनवारी पै॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

न सखी दूसरी सखी से कहती है-अरी सखि! तू बड़ी भोली है जो उस छलिया श्यामसुन्दर पर न्यौछावर हुई जा रही है। अरी सखि! तू उस छलिया को नहीं जानती वह बस आग लगाना ही जानता है, उसे बुझाना नहीं जानता। अरी सखि! जो अपने माँ-बाप का नहीं हुआ, उनको जेल में छोड़कर भाग आया, तू भला ऐसे कपटी पर कैसे विश्वास करती है? अरी सखि! उसको छल कपट का शिरोमणि समझ वह सबसे ऐसा ही कहता है कि तुझे तो मेरा प्राण समर्पित है और पलक-ओट होते ही भुला देता है। सखी ने कहा-तू जो कह रही है इसे मैं भली-भाँति जानती हूँ, किन्तु क्या करूँ। तब भी मन नहीं मानता। मैं इसे समझा कर हार गयी। अरी सखि! यह कैसा आश्चर्य है कि प्रियतम के दोषों को देखते हुए भी मन बरबस उन्हीं के बश में है। 'कृपालु' कहते हैं-अरी सखि! श्यामसुन्दर चिन्मय हैं अतएव इसमें आश्चर्य नहीं है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 941,940

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
