# नथवारी तिहारी बलिहार, प्यारी छवि का कहनो।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0995-M21-K008
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: प्रकीर्ण-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 8
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 472–473

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>नथवारी तिहारी बलिहार, प्यारी छवि का कहनो।  
<a id="line-2"></a>बहुरंगी-मुकुट-मणिन झाँकी,  
<a id="line-3"></a>तापर लर-मोतिन छवि बाँकी,  
<a id="line-4"></a>गुँथि वेणी फुलन श्रृंगार, प्यारी छवि का कहनो।  
<a id="line-5"></a>मनहरन दुहुँन श्रुति करनफूल,  
<a id="line-6"></a>नासा नथ-बेसर झुकी झूल,  
<a id="line-7"></a>लर-मोतिन की अजब बहार, प्यारी छवि का कहनो।  
<a id="line-8"></a>अँखियाँ मधु-विष-पीयूष घुरी,  
<a id="line-9"></a>मृदु हँसनि दशन-दुति जनु बिजुरी,  
<a id="line-10"></a>गर मोतिन मणिन को हार, प्यारी छवि का कहनो।  
<a id="line-11"></a>मणि-कंकन कर करपत्र चुरी,  
<a id="line-12"></a>मुँदरिन मनि दुति दामिनि जनु री,  
<a id="line-13"></a>रची मेहँदी सुघर अरुणार, प्यारी छवि का कहनो।  
<a id="line-14"></a>गोरे तनु सोहैं नील-वसन,  
<a id="line-15"></a>कटि कनक-किंकिनिन धुनि छननन,  
<a id="line-16"></a>भल पायल की धुनि झनकार, प्यारी छवि का कहनो।  
<a id="line-17"></a>छवि अरुण-मिहावरि अति प्यारी,  
<a id="line-18"></a>पग अँगुरिन बिछुवनि छवि न्यारी,  
<a id="line-19"></a>अलबेली “कृपालु” सरकार, प्यारी छवि का कहनो॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

वृषभानुदुलारी! मैं तुम पर बलिहार जाती हूँ, तुम्हारी मनोहर छवि अनिर्वचनीय है। रंग-बिरंगी मणियों से अलंकृत मुकुट एवं उस पर मोतियों की लड़ की झाँकी अत्यन्त ही बाँकी है। तुम्हारी गुथी हुई वेणी में फूलों का शृंगार अत्यन्त ही कमनीय है। दोनों कानों में मनोहर कर्णफूल, नासिका में नथ एवं बेसर का झुक-झुक कर झूलना तथा मोतियों की लड़ों की बहार देखते ही बनती है। तुम्हारी आँखों में मदिरा, विष एवं अमृत घुला हुआ है। तुम्हारे मन्द-मन्द हँसने पर दाँतों की चमक बिजली के समान चमकती है। तुम्हारे गले में मोतियों मणियों का हार सुशोभित है। हाथ में मणियों के कंकण एवं चूड़याँ अलंकृत हैं। अंगुलियों में अंगूठियों में जड़ी मणियों की कान्ति बिजली की तरह चमक रही है। हाथ में लाल मेहँदी, क्या ही सुन्दर सुवर्ण की किंकिणी की धुनि अत्यन्त मनोहारिणी है। चरणों में पायल की झनकार का क्या कहना है! लाल मिहावर का सौन्दर्य अनुपमेय है। पैर की अंगुलियों ड बिछुओं की छवि निराली है। 'कृपालु' कहते हैं कि हमारी सरकार अलबेली हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 940,939,938

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
