प्रकीर्ण-माधुरी · पद 10
नन्दलाल प्यारे, यशुदा-दुलारे, नैनों के तारे,
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: nandalāla pyāre, yashudā-dulāre, nainoṁ ke tāre, karūṁ tihārī manuhāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1नन्दलाल प्यारे, यशुदा-दुलारे, नैनों के तारे,
2करूँ तिहारी मनुहार।
3प्रेम-पिपासा लेकर आई,
4सुघर सलोनी छवि मन में समाई।
5ना तप जानूँ, ना जप जानूँ, ना पहिचानूँ,
6केवल आस तिहार।
7आशा का बंधन टूट न जाये,
8लगन मिलन की छूट न जाये।
9ओ गिरधारी! ओ बनवारी! कृष्णमुरारी!
10सुनि लेउ दीन पुकार।
11तुम बिनु पल छिन कल न परत है,
12विकल नैन दिन रैन झरत है।
13श्याम-सलोना, करि गयो टोना, दै गयो रोना,
14बाजी गई मैं हार।
15कैसे तुम बिनु हाय! रहूँ मैं,
16कैसे विरह बलाय सहूँ मैं।
17श्याम बेदरदी, कैसी कर दी, ऐसी कदर की,
18जाये “कृपालु” बलिहार॥
हिन्दी भावार्थ
हे हमारे प्यारे नंदलाल! हे यशोदा के लाल! हे आँखों के तारे! मैं तुमसे एक विनय करती हूँ। मैं तुम्हारे पार प्रेम की पिपासा लेकर आयी हूँ। तुम्हारी मनोहर छवि मेरे मन में बस गयी है। मैं तपश्चर्या एवं जप भी नहीं जानती, तुम्हारे रहस्यों को भी नहीं समझती, मैं तो केवल तुम्हारी आशा पर ही अवलम्बित हूँ। प्यारे! मेरी यह दृढ़ आशा तोड़ न देना मधुर-मिलन की व्याकुलता मिटा न देना, हे गिरिधारी! हे बनवारी! हे श्रीकृष्ण! हे मुरारी! मुझ अकिंचन की दीन- पुकार को सुन लो। तुम्हारे दर्शनों के बिना मुझे एक क्षण क भी चैन नहीं है। मेरे नेत्र व्याकुल होकर दिन-रात आँसू बहाय करते हैं। हाय! हाय!! श्यामसुन्दर तुमने तो मेरे ऊपर जादू स कर दिया है एवं मुझे सदा के लिए रोना दे दिया है। मैं तो सर्भ भाँति दाँव हार गयी। हे प्रियतम! तुम्हीं बताओ तुम्हारे बिना मै म प्रकार जीवित रहूँ एवं विरह के दुःसह दुःख को किस प्रकार सहूँ। हे निष्ठुर श्यामसुन्दर! तुमने यह क्या कर दिया। 'कृपालु' कहते हैं कि मैं तुम्हारे दिये हुए इस उपहार की बार-बार बलैया लेती हूँ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 936,937,935