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RADHEY RADHEY

प्रकीर्ण-माधुरी · पद 11

ना री जाने कछु रीति रसवारी री, अनारी वारी बनवारी।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: nā rī jāne kachhu rīti rasavārī rī, anārī vārī banavārī

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1ना री जाने कछु रीति रसवारी री, अनारी वारी बनवारी।

2रह लठ्ठ - गँवारन संग-संग,

3याते सबरोइ अड़बंग ढंग।

4का री जाने रसिकन गति न्यारी री, अनारी वारी बनवारी।

5पनघट घूँघट पट टारि भजै,

6सिर चुनरी उतारि न नेकु लजै,

7लावत उर मग कहि"प्यारी"री, अनारी वारी बनवारी।

8गुरुजन सन्मुखहूँ सैन मार,

9निधरक कह"करु टुक मोहिं प्यार",

10"बलिहारी"कह सुनि-सुनि गारी री, अनारी वारी बनवारी।

11सखि एक अचंभो आय मोय,

12तबहूँ सखियन मन-भाय सोय,

13शिव फिरत “कृपालु” बनि नारी री, अनारी वारी बनवारी॥

हिन्दी भावार्थ

एक सखी कहती है अरी वह अनाड़ी बनवारी रस- रीति कुछ नहीं जानता। वह लट्ठ-गँवारों के संग-संग रहता है, अतएव उसका सब कार्य अटपटा है। फिर भला रसिकों की निराली गति को वह कैसे जान सकता है? उसकी करतूत तो यह है कि पनघट पर घूँघट खोलकर भाग जाता है। कभी सिर से चुनरी उतार देता है और कभी निर्लज्ज मार्ग में 'प्यारी 'कु आलिंगन कर लेता है! कहाँ तक कहें? सास-ससुर आदि गुरुजनों के समक्ष भी कटाक्षपात करता रहता है एवं बेधड़क कहता है, 'अरी थोड़ा सा प्यार कर ले '। और जब मैं गाली देती हूँ तो उसके उत्तर में '"बलिहारी ''कह देता है। सखी! यह एक आश्चर्यजनक बात है कि इतना होने पर भी सखियों को श्यामसुन्दर ही अच्छे लगते हैं। 'कृपालु' कहते हैं ''अरी सखी! तेरी तो बात ही क्या है। भगवान् शंकर भी उसके लिये स्त्री बनकर घूमते रहते हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 935,934