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RADHEY RADHEY

प्रकीर्ण-माधुरी · पद 12

निर्मोहिया सों नेहा लगाय, हाय! मैं लुटि गई री।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: nirmohiyā soṁ nehā lagāya, hāya! maiṁ luṭi gaī rī

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1निर्मोहिया सों नेहा लगाय, हाय! मैं लुटि गई री।

2इक दिन अलि इकली जाति रही,

3बेचन बरसाने गाम दही,

4मग निपट लकुटि लिये आय, हाय! मैं लुटि गई री।

5बोल्यो"अलि लखु यह कुंज-गली,

6हौं हूँ इकलो तू हूँ इकली,

7मिलि इक-इक द्वै ह्वै जाय", हाय मैं लुटि गई री।

8हौं डाँटि कही"लंपट चल हट,

9आवत पति पाछेहिं लै लठ झट,

10दउँ हेला अबहिं फल पाय", हाय! मैं लुटि गई री।

11बोल्यो"अब तोहिं अपनी कर ली,

12पिटवाय चहै अपनाय अली!,

13सुख दैहों तोहिं लठ खाय", हाय! मैं लुटि गई री।

14यह सुनि गइ तन-मन-प्रान हार,

15हौं तेहि निहार सो मोहिं निहार,

16गिरी भू पै “कृपालु” कहि"हाय", हाय! मैं लुटि गई री॥

हिन्दी भावार्थ

एक सखी कहती है-अरी सखि! निर्मोही श्यामसुन्दर से प्यार करके मैं तो बेमौत मर गयी। एक दिन मैं अकेली बरसाने गाँव दही बेचने जा रही थी कि अचानक वह मार्ग में लठिया लिये आ गया और बोला-अरी सखि! देख कुंज- गली कितनी मनोहर है। मैं भी अकेला हूँ, तू भी अकेली है और यह तो तू जानती ही होगी कि एक-एक मिलकर दो हो जाता है। तब मैंने डाँट कर कहा-अरे लम्पर! चल दूर हट, मेरे पति लड़ लेकर मेरे पीछे ही आ रहे हैं, अभी पुकारूँगी और तुझे मेरे अकेलेपन का अच्छा फल मिल जायगा। इस पर उसने कहा-अरी सखि! अब तो तुझको मैंने अपनी बना ली, चाहे मुझे पिटवाये, चाहे अपनाये। अगर मुझे पिटवाने से ही सुख मिलता है तो मैं अवश्य लठ्ठ खाऊँगा। यह सुन कर मैंने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। प्रेम-विभोर होकर मैंने उसको ओर देखा और उसने भी मेरी ओर देखी 'कृपालु'हते हैं कि तत्पश्चात् सखी पृथ्वी पर मूर्च्छित होकर हाय! ऊह कर, गिर पड़ी।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 934,933