# निर्मोहिया सों नेहा लगाय, हाय! मैं लुटि गई री।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0999-M21-K012
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: प्रकीर्ण-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 12
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 476–477

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>निर्मोहिया सों नेहा लगाय, हाय! मैं लुटि गई री।  
<a id="line-2"></a>इक दिन अलि इकली जाति रही,  
<a id="line-3"></a>बेचन बरसाने गाम दही,  
<a id="line-4"></a>मग निपट लकुटि लिये आय, हाय! मैं लुटि गई री।  
<a id="line-5"></a>बोल्यो"अलि लखु यह कुंज-गली,  
<a id="line-6"></a>हौं हूँ इकलो तू हूँ इकली,  
<a id="line-7"></a>मिलि इक-इक द्वै ह्वै जाय", हाय मैं लुटि गई री।  
<a id="line-8"></a>हौं डाँटि कही"लंपट चल हट,  
<a id="line-9"></a>आवत पति पाछेहिं लै लठ झट,  
<a id="line-10"></a>दउँ हेला अबहिं फल पाय", हाय! मैं लुटि गई री।  
<a id="line-11"></a>बोल्यो"अब तोहिं अपनी कर ली,  
<a id="line-12"></a>पिटवाय चहै अपनाय अली!,  
<a id="line-13"></a>सुख दैहों तोहिं लठ खाय", हाय! मैं लुटि गई री।  
<a id="line-14"></a>यह सुनि गइ तन-मन-प्रान हार,  
<a id="line-15"></a>हौं तेहि निहार सो मोहिं निहार,  
<a id="line-16"></a>गिरी भू पै “कृपालु” कहि"हाय", हाय! मैं लुटि गई री॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक सखी कहती है-अरी सखि! निर्मोही श्यामसुन्दर से प्यार करके मैं तो बेमौत मर गयी। एक दिन मैं अकेली बरसाने गाँव दही बेचने जा रही थी कि अचानक वह मार्ग में लठिया लिये आ गया और बोला-अरी सखि! देख कुंज- गली कितनी मनोहर है। मैं भी अकेला हूँ, तू भी अकेली है और यह तो तू जानती ही होगी कि एक-एक मिलकर दो हो जाता है। तब मैंने डाँट कर कहा-अरे लम्पर! चल दूर हट, मेरे पति लड़ लेकर मेरे पीछे ही आ रहे हैं, अभी पुकारूँगी और तुझे मेरे अकेलेपन का अच्छा फल मिल जायगा। इस पर उसने कहा-अरी सखि! अब तो तुझको मैंने अपनी बना ली, चाहे मुझे पिटवाये, चाहे अपनाये। अगर मुझे पिटवाने से ही सुख मिलता है तो मैं अवश्य लठ्ठ खाऊँगा। यह सुन कर मैंने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। प्रेम-विभोर होकर मैंने उसको ओर देखा और उसने भी मेरी ओर देखी 'कृपालु'हते हैं कि तत्पश्चात् सखी पृथ्वी पर मूर्च्छित होकर हाय! ऊह कर, गिर पड़ी।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 934,933

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
