# ना री जाने कछु रीति रसवारी री, अनारी वारी बनवारी।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0998-M21-K011
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: प्रकीर्ण-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 11
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 475–476

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>ना री जाने कछु रीति रसवारी री, अनारी वारी बनवारी।  
<a id="line-2"></a>रह लठ्ठ - गँवारन संग-संग,  
<a id="line-3"></a>याते सबरोइ अड़बंग ढंग।  
<a id="line-4"></a>का री जाने रसिकन गति न्यारी री, अनारी वारी बनवारी।  
<a id="line-5"></a>पनघट घूँघट पट टारि भजै,  
<a id="line-6"></a>सिर चुनरी उतारि न नेकु लजै,  
<a id="line-7"></a>लावत उर मग कहि"प्यारी"री, अनारी वारी बनवारी।  
<a id="line-8"></a>गुरुजन सन्मुखहूँ सैन मार,  
<a id="line-9"></a>निधरक कह"करु टुक मोहिं प्यार",  
<a id="line-10"></a>"बलिहारी"कह सुनि-सुनि गारी री, अनारी वारी बनवारी।  
<a id="line-11"></a>सखि एक अचंभो आय मोय,  
<a id="line-12"></a>तबहूँ सखियन मन-भाय सोय,  
<a id="line-13"></a>शिव फिरत “कृपालु” बनि नारी री, अनारी वारी बनवारी॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक सखी कहती है अरी वह अनाड़ी बनवारी रस- रीति कुछ नहीं जानता। वह लट्ठ-गँवारों के संग-संग रहता है, अतएव उसका सब कार्य अटपटा है। फिर भला रसिकों की निराली गति को वह कैसे जान सकता है? उसकी करतूत तो यह है कि पनघट पर घूँघट खोलकर भाग जाता है। कभी सिर से चुनरी उतार देता है और कभी निर्लज्ज मार्ग में 'प्यारी 'कु आलिंगन कर लेता है! कहाँ तक कहें? सास-ससुर आदि गुरुजनों के समक्ष भी कटाक्षपात करता रहता है एवं बेधड़क कहता है, 'अरी थोड़ा सा प्यार कर ले '। और जब मैं गाली देती हूँ तो उसके उत्तर में '"बलिहारी ''कह देता है। सखी! यह एक आश्चर्यजनक बात है कि इतना होने पर भी सखियों को श्यामसुन्दर ही अच्छे लगते हैं। 'कृपालु' कहते हैं ''अरी सखी! तेरी तो बात ही क्या है। भगवान् शंकर भी उसके लिये स्त्री बनकर घूमते रहते हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 935,934

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
