# नन्दलाल प्यारे, यशुदा-दुलारे, नैनों के तारे,

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0997-M21-K010
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: प्रकीर्ण-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 10
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 474–475

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>नन्दलाल प्यारे, यशुदा-दुलारे, नैनों के तारे,  
<a id="line-2"></a>करूँ तिहारी मनुहार।  
<a id="line-3"></a>प्रेम-पिपासा लेकर आई,  
<a id="line-4"></a>सुघर सलोनी छवि मन में समाई।  
<a id="line-5"></a>ना तप जानूँ, ना जप जानूँ, ना पहिचानूँ,  
<a id="line-6"></a>केवल आस तिहार।  
<a id="line-7"></a>आशा का बंधन टूट न जाये,  
<a id="line-8"></a>लगन मिलन की छूट न जाये।  
<a id="line-9"></a>ओ गिरधारी! ओ बनवारी! कृष्णमुरारी!  
<a id="line-10"></a>सुनि लेउ दीन पुकार।  
<a id="line-11"></a>तुम बिनु पल छिन कल न परत है,  
<a id="line-12"></a>विकल नैन दिन रैन झरत है।  
<a id="line-13"></a>श्याम-सलोना, करि गयो टोना, दै गयो रोना,  
<a id="line-14"></a>बाजी गई मैं हार।  
<a id="line-15"></a>कैसे तुम बिनु हाय! रहूँ मैं,  
<a id="line-16"></a>कैसे विरह बलाय सहूँ मैं।  
<a id="line-17"></a>श्याम बेदरदी, कैसी कर दी, ऐसी कदर की,  
<a id="line-18"></a>जाये “कृपालु” बलिहार॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हे हमारे प्यारे नंदलाल! हे यशोदा के लाल! हे आँखों के तारे! मैं तुमसे एक विनय करती हूँ। मैं तुम्हारे पार प्रेम की पिपासा लेकर आयी हूँ। तुम्हारी मनोहर छवि मेरे मन में बस गयी है। मैं तपश्चर्या एवं जप भी नहीं जानती, तुम्हारे रहस्यों को भी नहीं समझती, मैं तो केवल तुम्हारी आशा पर ही अवलम्बित हूँ। प्यारे! मेरी यह दृढ़ आशा तोड़ न देना मधुर-मिलन की व्याकुलता मिटा न देना, हे गिरिधारी! हे बनवारी! हे श्रीकृष्ण! हे मुरारी! मुझ अकिंचन की दीन- पुकार को सुन लो। तुम्हारे दर्शनों के बिना मुझे एक क्षण क भी चैन नहीं है। मेरे नेत्र व्याकुल होकर दिन-रात आँसू बहाय करते हैं। हाय! हाय!! श्यामसुन्दर तुमने तो मेरे ऊपर जादू स कर दिया है एवं मुझे सदा के लिए रोना दे दिया है। मैं तो सर्भ भाँति दाँव हार गयी। हे प्रियतम! तुम्हीं बताओ तुम्हारे बिना मै म प्रकार जीवित रहूँ एवं विरह के दुःसह दुःख को किस प्रकार सहूँ। हे निष्ठुर श्यामसुन्दर! तुमने यह क्या कर दिया। 'कृपालु' कहते हैं कि मैं तुम्हारे दिये हुए इस उपहार की बार-बार बलैया लेती हूँ।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 936,937,935

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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