रसिया-माधुरी · पद 14
या ब्रज की, रीति निराली है।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: yā braja kī, rīti nirālī hai
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1या ब्रज की, रीति निराली है।
2ऐसो लाल यशोदा जायो, जो सब भाँति कुचाली है।
3वेद-पुरान प्रमान मान जग, ह्याँ की उलटी चाली है।
4श्रुति-आराध्य ब्रह्महूँ पावत, ब्रज बालनि की गाली है।
5सुरपति हूँ को करत निरादर, हँसत ग्वाल दै ताली है।
6कह “कृपालु” इन ब्रजवासिन-धन, एक लाल अरु लाली है॥
हिन्दी भावार्थ
एक रसिक कहता है कि इस दिव्य ब्रज की रीति अत्यन्त ही विलक्षण है। यशोदा मैया ने ऐसे पुत्र को जन्म दिया है जो सब प्रकार से अटपटा है। समस्त संसार वेद पुराण को मानता है, किन्तु यहाँ लोक-वेद-विरुद्ध व्यवहार होता है, यहाँ तक कि वेदों के द्वारा भी उपासित ब्रह्म श्यामसुन्दर निरक्षर वनचरियों की गाली खाता है। यहाँ देवराज इन्द्र का भी सखाओं द्वारा ताली बजाकर अपमान किया जाता है। कृपालु' कहते हैं कि इन ब्रजवासियों का एकमात्र धन युगल सरकार हैं। अतएव उनके निमित्त लोक-वेद का परित्याग परम वंदनीय है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 905