रसिया-माधुरी · पद 13
मोरी तोरी लर, ओरी गोरी! नँद को री।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: morī torī lara, orī gorī! naṁda ko rī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1मोरी तोरी लर, ओरी गोरी! नँद को री।
2कालिन्दी तट कालि गई रहि, सँग रहिं आलि! अलिन मोरी।
3आय कह्यो लखि मो तन ओरी,"को री! मोरी लर चोरी"।
4हौं भोरी पहिरी लर को री, कह"यह लर तो नहिं तोरी"।
5लर कर पकरि लँगर देखन मिस, मार्यो नैन सैन को री।
6पुनि कह कान"मोहिं गर-लरकरु, चह लर बनि गर लाग्यो री"।
7भई विभोर यदपि यह सुनि पै, कही"लाज अँचई-घोरी"।
8यह “कृपालु” सुनि झट लर तोरी, चट भाज्योकहि"भल जोरी"॥
हिन्दी भावार्थ
(एक सखी की अपनी अन्तरंग सखी से श्यामसुन्दर सम्बन्धी प्रेममयी कूटोक्ति-) अरी सखी! नंद के लाला ने मेरी मोतियों की लड़ तोड़ दी। मैं कल सखियों के साथ यमुना के किनारे गई थी। वह नटखट वहीं आ गया और मेरी ओर देखकर सबसे बोला अरी सखियों! किसी ने मेरी मोतियों की लड़ तो नहीं चुराई?''मैं भोली-भाली गले में पहनी हुई अपनी लड़ को नटखट की ओर दिखाती हुई बोली, ''देख यह तो तेरी लड़ नहीं है?''इतने में वह मेरे पास आ गया और मेरी पहनी हुई लड़ को हाथ से पकड़कर देखने के बहाने अपने तीखे कटाक्षपात द्वारा मुझे घायल कर दिया। मुझको ही अपने गले की लड़ बना ले ताकि मैं सदा तेरे गले से लगा रहूँ।'"यद्यपि यह सुनकर मैं प्रेम-विभोर हो गई फिर भी स्त्री-स्वभावानुसार मैंने कहा, ''तूने तो लाज को घोल कर पी लिया है।''"कृपालु' कहते हैं कि यह सुनते ही झटपट मेरी लड़ तोड़ दी और चटपट "मेरी तेरी जोड़ी बड़ी अच्छी है'', ऐसा कहकर भाग गया।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 904-905