रसिया-माधुरी · पद 15
रसिकन की, गति रसिकन जाने।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: rasikana kī, gati rasikana jāne
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1रसिकन की, गति रसिकन जाने।
2ज्यों कामिनि आलिंगन सुख कहँ, शिशु नहिं सपनेहुँ पहिचाने।
3गोपिन काम श्यामसुन्दर सों, सो निष्काम रसिक माने।
4दुर्वासा दूबहिं खाये पै, खाय गये सिगरे खाने।
5आत्माराम कहाय श्याम पै, नित्य रास गोपिन ठाने।
6कह “कृपालु” यह दिव्य विषय किमि, जाने विषयन-रस-साने॥
हिन्दी भावार्थ
एक रसिक कहता है कि रसिकों की अटपटी बातें रसिक ही समझ सकते हैं। जिस प्रकार पाँच वर्ष के भोले बालक को कामयुक्त युवती के आलिंगन का सुख स्वप्न में भी नहीं प्रतीत होता। उसी प्रकार अरसिक भी रसिकों की बातों से अपरिचित रहता है। आश्चर्य देखो! गोपियों को एकमात्र काम (प्रेम) श्यामसुन्दर से ही है, फिर भी उन्हें रसिक लोग परम निष्काम मानते हैं। दुर्वासा मुनि ने ब्रजांगनाओं द्वारा बहुमात्रा में बहु-व्यंजनों को खाकर भी दूब ही खायी, ऐसा रसिकों ने स्वीकार किया है। श्यामसुन्दर को वेद-शास्त्र 'आत्माराम कहते हैं, जबकि वे गोपियों के साथ नित्य रास-रमण करते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि सब दिव्य विषय की बातें हैं, जिन्हें प्राकृत विषयासक्त जीव किसी भी प्रकार नहीं समझ सकता।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 906