विरह-माधुरी · पद 54
ऊधो!, मैया सों कहियो जाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, maiyā soṁ kahiyo jāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1ऊधो!, मैया सों कहियो जाय।
2तुम्हरो लाल कियो पालागन, चरण कमल सिर नाय।
3यदपि मधुपुरी सकल राज सुख, असन-बसन बहुताय।
4तदपि भाव-वात्सल्य-हीन सब, फीको परत लखाय।
5विष पिलाय कुच लाय पूतना, गई परम पद पाय।
6"अब मैया को कहा दऊँ"यह, निशिदिन सोचत माय।
7हौं ऋणियाँ युग युग लौं तेरो, आऊँ का मुँह लाय।
8लोकहुँ रीति “कृपालु” ऋणी जो, सो परदेस सिधाय॥
हिन्दी भावार्थ
(श्रीकृष्ण मथुरा से उद्धव के द्वारा अपनी मैया को संदेश भेज रहे हैं।) हे उद्धव! मेरी मैया से बड़ी ही नम्रता से जाकर कहना कि तुम्हारे लाला ने तुम्हारे चरणकमलों में सिर रख कर प्रणाम कहलाया है और कहा है कि यद्यपि मथुरा में भोजन-चस्त्र आदि समस्त सुख राजाओं के समान प्रचुर मात्रा में प्राप्त हैं फिर भी वह सब वात्सल्य-भाव से हीन होने के कारण मुझे अत्यन्त ही फीके लगते हैं। यदि मैया कहे कि फिर वह आता क्यों नहीं? तब उससे कहना कि वह दिन-रात इसी विचार में पड़ा रहता है कि जिस पूतना ने अपने स्तनों में विष लगा कर मारना चाहा था उसे तो मैंने अपना लोक दे दिया है, फिर जिस मैया ने मुझे अपने स्तनों से अमृत पिलाया है उसे मेरे पास देने के लिये है ही क्या? यदि मैया कहे कि इतने दिन से विचार करते करते क्या निश्चय किया? तब उससे कहना कि मैं करोड़ों युगों तक तुम्हारा ऋणी रहूँगा। मेरे पास मेरे लोक से बढ़कर कोई वस्तु देने को है ही नहीं। यदि मैं आऊँ भी तो कौन सा मुँह लेकर आऊँ। कृपालु' कहते हैं कि संसार में भी ऐसी प्रणाली देखी जाती है कि जो व्यक्ति अधिक ऋणी हो जाता है वह विदेश को भाग जाता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 752-753