# ऊधो!, मैया सों कहियो जाय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0805-M19-K054
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 54
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 377–377

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>ऊधो!, मैया सों कहियो जाय।  
<a id="line-2"></a>तुम्हरो लाल कियो पालागन, चरण कमल सिर नाय।  
<a id="line-3"></a>यदपि मधुपुरी सकल राज सुख, असन-बसन बहुताय।  
<a id="line-4"></a>तदपि भाव-वात्सल्य-हीन सब, फीको परत लखाय।  
<a id="line-5"></a>विष पिलाय कुच लाय पूतना, गई परम पद पाय।  
<a id="line-6"></a>"अब मैया को कहा दऊँ"यह, निशिदिन सोचत माय।  
<a id="line-7"></a>हौं ऋणियाँ युग युग लौं तेरो, आऊँ का मुँह लाय।  
<a id="line-8"></a>लोकहुँ रीति “कृपालु” ऋणी जो, सो परदेस सिधाय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(श्रीकृष्ण मथुरा से उद्धव के द्वारा अपनी मैया को संदेश भेज रहे हैं।) हे उद्धव! मेरी मैया से बड़ी ही नम्रता से जाकर कहना कि तुम्हारे लाला ने तुम्हारे चरणकमलों में सिर रख कर प्रणाम कहलाया है और कहा है कि यद्यपि मथुरा में भोजन-चस्त्र आदि समस्त सुख राजाओं के समान प्रचुर मात्रा में प्राप्त हैं फिर भी वह सब वात्सल्य-भाव से हीन होने के कारण मुझे अत्यन्त ही फीके लगते हैं। यदि मैया कहे कि फिर वह आता क्यों नहीं? तब उससे कहना कि वह दिन-रात इसी विचार में पड़ा रहता है कि जिस पूतना ने अपने स्तनों में विष लगा कर मारना चाहा था उसे तो मैंने अपना लोक दे दिया है, फिर जिस मैया ने मुझे अपने स्तनों से अमृत पिलाया है उसे मेरे पास देने के लिये है ही क्या? यदि मैया कहे कि इतने दिन से विचार करते करते क्या निश्चय किया? तब उससे कहना कि मैं करोड़ों युगों तक तुम्हारा ऋणी रहूँगा। मेरे पास मेरे लोक से बढ़कर कोई वस्तु देने को है ही नहीं। यदि मैं आऊँ भी तो कौन सा मुँह लेकर आऊँ। कृपालु' कहते हैं कि संसार में भी ऐसी प्रणाली देखी जाती है कि जो व्यक्ति अधिक ऋणी हो जाता है वह विदेश को भाग जाता है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 752-753

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
