विरह-माधुरी · पद 53
ऊधो!, माधो की गति न्यारी।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, mādho kī gati nyārī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1ऊधो!, माधो की गति न्यारी।
2कर्तुमकर्तुमन्यथा कर्तुं, समरथ सो गिरिधारी।
3निष्कामिनि ब्रज भामिनि तजि किय,कामिनि कुबरिहिं प्यारी।
4भूलि गये जो नंद बबा अरु, यशुमति सी महतारी।
5वे यदि भूलि जाँय ब्रजनारिन, कौन अचंभो भारी।
6हम जानति “कृपालु” यह नीके, हरि हैं लीलाधारी॥
हिन्दी भावार्थ
गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि उद्धव। श्यामसुन्दर को लीला निराली है। वे मन भाया करने न करने एवं उल्टा द निष्काम प्रेमिका गोपिकाओं को छोड़ कर सकाम प्रेम करने वाली कुबरी को प्यारी बना लिया है। और कहाँ तक कहें, जो नन्द सरीखे बाबा एवं यशोदा सरीखी मैया को भूल सकते हैं उनके लिए हम सब ब्रजांगनाओं का भूल जाना कौन सी आश्चर्य की बात है! "कृपालु, के शब्दों में गोपियाँ कहती हैं कि फिर भी हम यह भली-भाँति जानती हैं कि यह सब श्यामसुन्दर की लीला मात्र है। मूर्ख व्यक्ति ही उनकी लीलाओं के वास्तविक स्वरूप को न समझ कर आक्षेप कर सकता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 751-752